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बढ़ रहीं ग्लेशियर झीलें खतरे की घंटी

गढ़वाल में स्थित ग्लेशियरों के नीचे वाले इलाकों में झील फटने से होने वाली तबाही का खतरा दूसरे क्षेत्रों से अधिक ए.एस. रावत, नई दिल्ली जलवायु परिवर्तन के असर से उत्तराखंड अछूता नहीं है। राज्य में बारहमासी नदियां मौसमी नदियों में तब्दील हो रही हैं।

गढ़वाल में स्थित ग्लेशियरों के नीचे वाले इलाकों में झील फटने से होने वाली तबाही का खतरा दूसरे क्षेत्रों से अधिक

ए.एस. रावत, नई दिल्ली

जलवायु परिवर्तन के असर से उत्तराखंड अछूता नहीं है। राज्य में बारहमासी नदियां मौसमी नदियों में तब्दील हो रही हैं। ये वे नदियां हैं जिन्हें ग्लेशियरों से पानी मिलता था। हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियरों की संख्या उत्तराखंड से दोगुनी से ज्यादा है लेकिन हिमाचल की तुलना में यहां के ग्लेशियरों को अतिसंवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर गढ़वाल क्षेत्र में स्थित ग्लेशियरों पर पड़ रहा है।यहां सुप्रा ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। भले ही उत्तराखंड में ग्लेशियरों की संख्या हिमाचल से कम हो लेकिन ग्लेशियर झीलों की संख्या तीन गुनी से भी ज्यादा है। केदारनाथ आपदा के बाद यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि झील फटने के बाद तबाही पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।
दरअसल, 2013 में केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद यह जरूरत महसूस की गई कि ग्लेशियर क्षेत्रों की झीलों का मानचित्रण किया जाए। इससे झीलों के संबंध में वस्तुस्थिति का पता रहेगा और इसके साथ ही समय रहते उपाय किए जाएंगे। इसी क्रम में देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने आईआईटी खड़गपुर के साथ मिलकर ग्लेशियर झीलों का अध्ययन किया। ग्लेशियरों के मानचित्रण से यह चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं।

उत्तराखंड में 809 सुप्रा-ग्लेशियर झीलें हैं। हिमाचल प्रदेश में इनकी संख्या 228 है। बर्फ पिघलने पर सुप्रा ग्लेशियर झीलें ग्लेशियर की सतह पर बनती हैं। यह जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का संकेत होता है। इस शोध के प्रमुख और वाडिया संस्थान में ग्लेशियोलॉजी केंद्र के वैज्ञानिक राकेश भांबरी के मुताबिक, उत्तराखंड के ग्लेशियर ज्यादा संवेदनशील हैं, क्योंकि हिमाचल प्रदेश के ग्लेशियरों की तुलना में इन्हें सूरज के ज्यादा विकिरण का सामना करना पड़ता है।
इसके साथ ही उत्तराखंड में ग्लेशियरों के पिघलने के लिए मानसून भी जिम्मेदार है। ग्लेशियर के निचले अक्षांशों पर होने की वजह से यहां सौर विकिरण अधिक है। जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां बर्फबारी के बजाए बारिश होती है। इससे जमी हुई बर्फ तेजी से पिघलती है। यही वजह है कि ग्लेशियर सिकुड़ जाते हैं। वहीं हिमाचल प्रदेश में ग्लेश्यिर ज्यादा बारिश वाले इलाकों से दूर हैं। शोध से यह भी पता चला है कि हिमाचल प्रदेश में पश्चिमी विक्षोभ के चलते ज्यादा बर्फबारी होती है। इसलिए यहां ग्लेशियरों में बर्फ बनी रहती है। उत्तराखंड में ऐसी स्थिति नहीं बनती। यहां मानसून अधिक प्रभावित हुआ है। इससे आने वाले समय में यहां जलस्रोतों में दिक्कत आएगी।

रिसोर्सेट-2 एलआईएसएस 4 सैटेलाइट की मदद से जुटाई गई तस्वीरों के अध्ययन से विज्ञानियों ने पाया कि उत्तराखंड में 21481 वर्ग किमी क्षेत्र में 1474 ग्लेशियरों में 1266 झीलें पाई गई हैं। इनमें ग्लेशियर बॉडी में बनने वाली झीलों सुप्रा ग्लेशियर की संख्या 809 है। लेकिन हिमाचल के 3199 वर्ग किमी क्षेत्र में 3273 ग्लेशियर है, लेकिन कुल झीलों की संख्या 958 है और सुप्रा ग्लेशियर झीलों की संख्या सिर्फ 228 है।
ये झीलें जलवायु के लिहाज से बहुत संवेदनशील हैं। अगर ये झीलें फटीं तो बहुत बड़ी आपदा को जन्म दे सकती हैं। केदारनाथ से ऊपर चोरबाड़ी ग्लेशियर के दायरे में आने वाला गांधी सरोवर ग्लेशियर के मलबे से बनी झील थी। यह लगातार तेज बारिश और ग्लेशियरों के पिघलने के चलते फट गई। इसका परिणाम 2013 में आई हिमालयी सुनामी के रूप में देखा जा चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मानचित्रण से ग्लेशियरों की गतिकी को समझने में मदद मिलेगी। इससे जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियरों के पिघलने और इस क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों की संख्या बढ़ने से होने वाले प्रभाव को मापने के लिए संदर्भ डाटाबेस उपलब्ध हो सकेगा। इससे खतरनाक श्रेणी में आने वाली झीलों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी।

वर्ष 2015 में भी इस तरह का शोध किया गया था। ताकि उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों का डाटाबेस तैयार किया जा सके। अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक, उत्तराखंड में 1,226 ग्लेशियर झीलें हैं। इनमें से 329 ग्लेशियरों के साथ बहकर आए मलबे से तैयार हुई हैं।

भांबरी बताते हैं, हिमाचल में 958 और उत्तराखंड में 1,266 झीलों का पता लगाने के बाद अब हम उनके आकार और गहराई में आ रहे बदलाव का अध्ययन करने में सफल हो सकेंगे। इसमें मौजूदा डाटा की भविष्य के डाटा से तुलना की जा सकेगी। इस शोध के बाद उत्तराखंड या हिमाचल में नई ग्लेशियर झील का निर्माण ग्लेशियर के पिघलने का संकेत होगा। ग्लेशियर झीलों की रफ्तार बढ़ने को इसी से समझा जा सकता है कि 2004 में हिमाचल में 156 ग्लेशियर झीलों की पहचान हुई थी, 2014 में यह आंकड़ा बढ़कर 779 पहुंच गया।

पुराने शोधों और नए शोध में सबसे बड़ा अंतर सैटेलाइट से मिली तस्वीरों के इस्तेमाल से आया है। 2004 में जब इस संबंध में शोध किया गया तो आईआरएस 1डी सैटेलाइट की मदद ली गई। इसमें झीलों की पहचान के लिए कोई न्यूनतम तरीका नहीं था। 2014 का शोध रिसोर्सेट-3 एलआईएसएस 3 सैटेलाइट से मिली तस्वीरों पर आधारित है। लेकिन इसमें सिर्फ उन्हीं झीलों का पता लग सका जिनका क्षेत्रफल 0.05 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। लेकिन हालिया शोध से 0.0005 वर्ग किलोमीटर दायरे वाली झीलों की भी पहचान हो सकी है।

इस शोध के दौरान जिन तस्वीरों का अध्ययन किया गया, वह देश की सबसे बेहतरीन सैटेलाइट तकनीक से हासिल की गई हैं। पुराने शोधों में कई ऐसी झीलें भी थीं, जिन्हें स्पष्ट तस्वीरें न होने के कारण पहचानना मुश्किल था। लेकिन नए शोध से काफी चीजें स्पष्ट हो गई हैं।
– राकेश भांबरी, वैज्ञानिक, ग्लेशियोलॉजी केंद्र, वाडिया संस्थान

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