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गांव में आधुनिक शिक्षा का अनूठा प्रयास

गांव के बच्चों को पढ़ाने के लिए गुड़गांव से हर हफ्ते अपने गांव जाते हैं आशीष डबराल, आधुनिक शिक्षा के साथ आर्ट एंड क्रॉफ्ट और आधुनिक उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण भी दे रहे, पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ा रहे रोबोटिक्स

ए एस रावत

उत्तराखंड से पलायन मानो नियति ही बन चुका है। पिछले एक दशक में पहाड़ से रिकॉर्ड पलायन हुआ है। सबसे बुरी स्थिति पौड़ी और अल्मोड़ा जिले की है। पहाड़ों से होने वाले पलायन का मूल कारण गरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा और रोजगार के अवसरों का न होना है। उत्तराखंड के दो बड़े जिलों पौड़ी और अल्मोड़ा के 748 स्कूलों में कोई छात्र नहीं बचा है। राज्य के गठन के बाद से करीब 200 स्कूल ऐसे हैं, जहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या तेजी से कम हुई है। यह तस्वीर का वो स्याह पहलू है, जो झकझोरता है।लेकिन तस्वीर का एक चमकदार पहलू भी है। वह है अपनी मिट्टी से जुड़ाव और उसके लिए कुछ करने की चाह। ऐसे ही एक प्रयास की कहानी है, गुड़गांव में रहने वाले आशीष डबराल की। 34 साल के आशीष गुड़गांव से हर सप्ताहंत (वीकएंड) पर अपने गांव पहुंचते हैं और बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए उन्हें हर हफ्ते करीब 750 किलोमीटर का सफर करना होता है। वह न सिर्फ बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का भागीरथ प्रयास कर रहे हैं, बल्कि उन्हें आर्ट एंड क्रॉफ्ट और आधुनिक उपकरणों को चलाने का भी प्रशिक्षण दे रहे हैं।

पौड़ी गढ़वाल जिले के तिमरी गांव में पले-बढ़े आशीष का मानना है कि आरामदायक जिंदगी की चाह, रोगगार और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोग पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। जब बात बच्चों की शिक्षा की आती है तो वे समझौता नहीं करना चाहते। गांवों में एजुकेशन सिस्टम बहुत पुराने ढर्रे पर चल रहा है। लेकिन यह भी हकीकत है कि इन लोगों में कहीं न कहीं अपने गांवों को छोड़ने की टीस है। माइक्रोसॉफ्ट से सर्टिफिकेट कोर्स करने के बाद डबराल ने देश-विदेश में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया। इसके बाद वह गुड़गांव में बस गए। डबराल बताते हैं कि अपने गांव से दूर रहकर काम करते हुए कभी ऐसा नहीं हुआ जब मुझे अपने घर-गांव की याद न आई हो। 1882 में मेरे पूर्वजों ने एक स्कूल शुरू किया था। तिमली संस्कृत पाठशाला। इसमें सैकड़ों छात्रों को संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी की शिक्षा दी गई। बाद में सरकार ने इस स्कूल का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। उसे जूनियर हाईस्कूल में बदल दिया गया। जब मैं स्कूल में था, तब वहां करीब 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ते थे। लेकिन तेजी से हुए पलायन के चलते यह संख्या पांच तक सिमट गई। यही मेरे मन को कचोटता है। लिहाजा मैंने तय किया कि मुझे अपने इलाके में शिक्षा के लिए कुछ करना होगा, ताकि मैं अपने भाइयों को वापस गांव की ओर मोड़ सकूं। मैं उस जगह के लिए कुछ करना चाहता हूं, जहां से मेरा संबंध है।

तिमली विद्यापीठ की शुरुआत

आशीष ने अपनी मेहनत की कमाई और कुछ दोस्तों की मदद से जनवरी 2014 में तिमली विद्यापीठ की शुरूआत की। यह एक प्रौद्योगिकी केंद्र और कंप्यूटर की शिक्षा देने वाला संस्थान है। देवीखेत में बने इस सेंटर को यूनीवर्सल गुरुकुल टेक्नोलॉजी सेंटर के छात्रों द्वारा चलाया जाता है। अभी तक यहां 70 से ज्यादा बच्चों को शुरुआती कंप्यूटर शिक्षा दी गई है। इसमें के कई छात्रों ने एक साल का कोर्स पूरा कर लिया है। आशीष बताते हैं कि मैंने अपनी टीम के साथ एक सर्विस सेंटर भी स्थापित किया है। इसमें छात्र आसपास के गांव वालों को पैनकार्ड, पासपोर्ट बनाने तथा ऑनलाइन खरीदारी करने में मदद करते हैं। इसके बाद आशीष ने मार्च 2015 में गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोला। इस समय 40-50 बच्चे इस पहल का लाभ उठा रहे हैं। आशीष को इसमें कुछ ऐसे जुझारू शिक्षकों का साथ मिल रहा है, जिनके लिए पढ़ाना एक जुनून है। आशीष ने बताया कि 2016 में उनकी मौजूदा कंपनी ब्रिटिश टेलीकॉम ने दूरदराज के इलाकों में डिजिटल स्किल को बढ़ावा देने के लिए 50,000 रुपये का इनाम दिया।कुछ और पैसों की व्यवस्था कर मैंने स्कूल में चार कमरे बनवा लिए।

दूसरों से अलग है यह संस्थान

तिमली विद्यापीठ कई मायनों में दूसरे संस्थानों से अलग है। यह उत्तराखंड के ग्रामीण इलाके का एकमात्र संस्थान है, जो ब्रिटेन के स्कूलों के साथ पार्टनरशिप कर रहा है। इससे यहां के बच्चों को गुड गवर्नेंस, प्रोफेशनलिज्म और लीडरशिप जैसी खूबियों को समझने और सीखने में मदद मिलती है। वह दूसरे के साथ अंग्रेजी में संवाद करना सीख पाते हैं। इसके बदले में हम वहां के बच्चों को योग और ध्यान जैसी पारंपरिक पद्धतियां सिखाते हैं। हमारे छात्र वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये ब्रिटेन के बच्चों से जुड़ते हैं। यह पहला स्कूल है, जो पहली कक्षा के बच्चों को रोबोटिक्स सिखा रहा है। हमारे स्कूल के बच्चों को 2017 में वर्ल्ड रोबोटिक ओलंपियाड में शामिल होने का मौका मिला। हमने सरकारी स्कूलों को पांच सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी केंद्र उपलब्ध कराए हैं। इनमें सभी बच्चे मुफ्त में शिक्षा पाते हैं।

वैदिक एजुकेशन एवं रिसर्च सेंटर स्थापित करने का ख्वाब

आशीष उस विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जो उनके पूर्वज छोड़ गए हैं। उनकी इच्छा अगले पांच साल में श्री तिमली वैदिक एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर स्थापित करने की है। यह प्रयास ऐसे गांवों को तैयार करने का होगा, जहां पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों से विकास हो। जहां युवाओं को हार्टीकल्चर, एग्रीकल्चर और फार्मिंग से रोजगार मिले। उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा गांव में ही उपलब्ध हो। वह कहते हैं, मैं उत्तराखंड की उस विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर चिंतित हूं, जिसकी हमारे युवा अनदेखी कर रहे हैं। इस सेंटर की मदद से मेरा प्रयास नई पीढ़ी को पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक का महत्व समझाना होगा।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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