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अवनि भर रहा महिला उद्मिता की उड़ान

अवनि की शुरुआत का उद्देश्य महिलाओं और युवतियों को वित्तीय आजादी दिलाने के लिए उनके कौशल को निखारना था। दो दशक तक काम करने के बाद अवनि ने घरेलू महिलाओँ को आय का निरंतर स्रोत बना दिया है वाई एस बिष्ट महिला उद्यमिता के माध्यम

अवनि की शुरुआत का उद्देश्य महिलाओं और युवतियों को वित्तीय आजादी दिलाने के लिए उनके कौशल को निखारना था। दो दशक तक काम करने के बाद अवनि ने घरेलू महिलाओँ को आय का निरंतर स्रोत बना दिया है

वाई एस बिष्ट

महिला उद्यमिता के माध्यम से महिला सशक्तीकरण के लंबे सफर का नाम है अवनि। ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत बुनाई, कताई और प्राकृतिक रंगों के उत्पादन और रंगाई के कामको प्रोत्साहन देने के लिए 1999 में शुरू हुआ अवनि का प्रयास एक बड़ा आकार ले चुका है। उत्तराखंड के दो जिले बागेश्वर और पिथौरागढ़ में 1500 से ज्यादा ऑर्टीजन इस संगठन के माध्यम से रोजगार पा रहे हैं। अवनि के लाभार्थियों में 76 फीसदी संख्या महिलाओं की है।

पहाड़ के लगाव के चलते करीब 20 साल पहले रश्मि भारती और राजेश जैन दिल्ली से पिथौरागढ़ के बेरीनाग आए। उद्देश्य था, पहाड़ के सुदूरवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए कुछ करना, उनकी परेशानियों को समझना और उनके जीवन स्तर में सुधार लाना। इन्हीं विचारों के साथ 1999 में अवनि की नींव पड़ी। इस स्वयंसहायता समूह ने सबसे पहले बिजली की किल्लत को दूर करने के लिए ग्रामीण इलाकों में सौर लाइटों को उपलब्ध कराने का काम किया। यहां के लोगों के लिए कुछ करने का था। इसके बाद शुरु हुआ गरीब से गरीब परिवार के लिए आय के स्रोत पैदा करने का काम। शुरुआत हाथ से होने वाली पारंपरिक कताई, बुनाई और रंगाई से हुई। काफी रिसर्च के बाद अवनि ने कुमाऊं क्षेत्र में होने वाले ऐसे पौधों के बारे में पता लगाया जिनसे रंगाई के काम को आगे बढ़ाया जा सके। रंगाई और चित्रकारी के लिए प्राकृतिक पौधों पर आधारित जलरंगों ता इस्तेमाल किया गया। इस दौरान किसानों को ऐसे पौधों एवं पेड़ों के संरक्षण और खेती के लिए तैयार किया गया जो रंगाई के काम आते हैं। आज अवनि कुमाऊं के 50 गांवों में हाथ से रंगाई के काम को फैला चुका है। इसके अलावा अवनि ने हाथ से होने वाली कताई की पारंपरिक तकनीक को आगे बढ़ाया।

अवनि ने शुरुआत इस उद्देश्य के साथ की थी कि वह महिलाओं और युवतियों को वित्तीय आजादी दिलाने के लिए उनके कौशल को निखारेगा। इतने साल काम करने के बाद अवनि ने इन इलाकों में घरेलू महिलाओँ को आय का निरंतर स्रोत बना दिया है। अवनि से जुड़ने वाली युवतियां आज अपने परिवार की कमाऊ सदस्य हैं। आर्थिक तौर पर सक्षम बनने का यह भी असर हुआ कि इन इलाकों में कच्ची उम्र में शादी न करने को लेकर जागरुकता आई है। अवनि ने अपने कार्यबल में आसपास के गांवों के परिवारों को ही जोड़ा है। अवनि के परिसर में उनके लिए काम करने वालों के बच्चों का स्कूल भी चलाया जा रहा है। अवनि की पहुंच आज 61 गांव तक है। इसके अलावा 31 लोग इस संस्था से सीधे तौर पर जुड़े हैं। यह संगठन महिला समूहों और गांव स्तर पर बनी संस्थाओं के साथ काम करता है। इन समूहों की हर महीने बैठक होती है, जिसमें नए कार्यक्रमों और इससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है।

रश्मि बताती हैं कि उनके एक दर्जन से अधिक केंद्र हैं। सभी केंद्रों में ऊन और रेशम की कताई-बुनाई के साथ प्राकृतिक तरीके से रंग बनाने का काम होता है। इन केंद्रों के जरिये महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। बागेश्वर में दिगोल, बासती, धर्मगढ़ व थांगा और पिथौरागढ़ में चनकाना, सुकना व त्रिपुरादेवी आदि स्थानों पर अवनि के प्रशिक्षण केंद्र हैं। संगठन के सदस्य राजेंद्र कुमार जोशी के अनुसार, रंग बनाने के लिए अखरोट की छाल, अनार के छिलके व बसूंटी (खरपतवार) का इस्तेमाल किया जाता है। रंग का उपयोग कपड़ों, दवाओं व कास्मेटिक उत्पादों में भी किया जाता है।ऊन से बने शॉल और स्टोल के साथ रेशमी कपड़े भी बनाए जाते हैं। धारचूला के सीमावर्ती गांवों और हर्षिल घाटी के भेड़पालकों से ऊन खरीदी जाती है। वहीं उत्तर-पूर्व और बिहार से रेशम आयात कर कपड़े बनाए जाते हैं। बुनाई का काम जटिल होने के कारण एक दिन में महज दो से ढाई मीटर कपड़ा ही तैयार हो पाता है, लेकिन गुणवत्ता के कारण इन उत्पादों की काफी डिमांड है। माल हाथों हाथ बिक जाता है।पहाड़ में पहली बार इंडिगो की खेती शुरू की गई है। इंडिगो मुख्य रूप से नील की ही प्रजाति है। इसका इस्तेमाल कपड़े रंगने में होता है। संगठन ने बागेश्वर और पिथौरागढ़ की पथरीली जमीन पर इंडिगो की खेती शुरू की। रश्मि बताती हैं कि इसकी खेती में कम पानी लगता है। साथ ही बंदर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते। गांवों में महिलाओं को कार्य के अनुपात में आय होती है। बुनकर महिलाएं स्थायी रूप से कार्य करती हैं और महीने में पांच से सात हजार रुपये तक कमा लेती हैं। अन्य कारीगर रंगाई सामग्री के लिए इंडिगो की खेती से आय अर्जित करते हैं। इंडिगो के तीन माह के फसल चक्र के दौरान 10 से 12 दिन के कार्य से महिलाएं तीन से छह हजार रुपये प्रति सीजन कमा रही हैं। अवनि की योजना प्राकृतिक रंगाई के काम को बढ़ाते हुए 2,500 लोगों को रोजगार देने की है। इसका सीधा अर्थ हुआ कि करीब 25,000 लोग इसका सीधा लाभ पाएंगे। इसके अलावा, यह संस्था 30,000 ग्रामीण परिवारों की जरूरतों के लिए क्लीन एनर्जी उपलब्ध कराने का भी इरादा रखती है।

नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित हुई संस्था

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अवनि को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार 2018 से नवाजा गया है। राष्ट्रपति भवनमें आयोजित समारोह में अवनि की संस्थापक सचिव रश्मि भारती ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से यह पुरस्कार लिया। पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपये की धनराशि और प्रशस्ति पत्र दिया गया।

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