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कैफे री-साइकिल : दो लड़कियों के आत्मनिर्भर बनने की कहानी

एएस रावत

कहते हैं भीड़ से अलग दिखना हो तो कुछ अलग करना भी होगा। देहरादून-मसूरी रोड पर रेस्टोरेंट की भीड़ में एक अलग का कैफे इसी खूबी से सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है। … कैफे री-साइकिल। नाम से ही साफ हो जाता है कि यह पूरी तरह बेकार और कबाड़ हो चुकी चीजों से बना होगा। लेकिन यहां आने पर साइकिल के पुराने रिम, गाड़ियों के टायर और पुराने संदूक को देखकर लगता ही नहीं कि इन्हें कभी कबाड़ में फेंक दिया गया था।

इस कैफे को चलाती हैं अर्चना ग्वाड़ी और स्वाति डोभाल। पौड़ी गढ़वाल की अर्चना पेशे से इंटीरियर डिजाइनिंग हैं और स्वाति ने गुड़गांव से एमबीए किया है। दोनों ही अपना काम शुरू करने से पहले अच्छी नौकरी करते थे। इन दोनों की मुलाकात की कहानी काफी दिलचस्प है। इन दोनों की मुलाकात उस दौर में हुई जब दिल्ली में निर्भया को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन चल रहा था। एक शहर से होने के कारण दो अजनबियों में दोस्ती हुई और कुछ ही दिन में फैसला कर लिया कि अब अपने शहर में जाकर कुछ अपना काम करेंगे। अब सवाल था कि क्या किया जाए। इन्हीं सवालों के बीच दोनों एक संस्था से जुड़ गए। यहां महिला सशक्तिकरण के लिए काम किया। कुछ समय काम करने के बाद दोनों के मन में यह साफ हो गया था कि अपने लिए कुछ करेंगे। ऐसा कुछ करेंगे, जिसे देखकर दूसरी महिलाएं भी आगे आएं।

अर्चना के मुताबिक, कई ऐसे फील्ड हैं, जिन्हें अघोषित तरीके से पुरुषों का मान लिया गया है। उनमें से ही एक फील्ड है, रेस्टोरेंट या कैफे का। हमें ये माइंडसेट तोड़ना था। इसलिए बहुत सोच विचार के बाद शुरुआत टिफिन सर्विस से की। अर्चना बताती हैं कि झट से फैसला तो ले लिया लेकिन मुश्किलें कई थी। पहले तो घरवालों को ही नहीं बताया और जब उन्हें पता चला तो विरोध घर से ही शुरू हो गया। घरवाले इस बात से नाराज थे कि इतनी पढ़ाई करने के बाद टिफिन सर्विस चला रही हैं। हालांकि कुछ लोगों ने समझाया कि लड़कियां खुद से कुछ करना चाहती हैं तो उन्हें सपोर्ट करना चाहिए। इसके बाद घरवाले सामान्य हो गए।

बहरहाल, शुरुआत पांच ऑर्डर से हुई। हमने कुछ महिलाओं को अपने साथ रखा। फिर धीरे-धीरे ऑर्डर की संख्या बढ़ने लगी। अब सवाल था कि इन्हें पहुंचाया कैसे जाए। फिर हमने खुद ही स्कूटी से टिफिन पहुंचाने का काम शुरू किया। जब हम टिफिन लेकर जाते तो लोग अजीब नजरों से देखते। अर्चना के मुताबिक, कुछ ने हौसलाअफजाई की तो कुछ ने ‘अच्छे घर की लड़कियां, कैसा काम कर रही है’, यह कहकर ताना मारा। हालांकि इरादा मजबूत था तो किसी की कही बात को दिल से नहीं लगाया।

खाने की बेहतर क्वालिटी और कम दाम के चलते जल्द ही काम ने रफ्तार पकड़ ली। इसके बाद स्वाति और अर्चना ने सोचा कि क्यों न पहाड़ के पारंपरिक अनाज और पकवानों पर काम किया जाए। इसके लिए उन्होंने रस्यांण नाम से सोसाइटी बनाई। इसके जरिये दोनों पहाड़ के अलग-अलग क्षेत्रों से उत्पाद मंगाते और उन्हें देहरादून व अन्य स्थानों पर बनाकर बेचते। ये आइडिया भी चल निकला और दोनों ने कैटरिंग का काम शुरू कर दिया।

अर्चना के मुताबिक, हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छ भारत अभियान से काफी प्रभावित थे। लेकिन हमने देखा कि स्वच्छता तो जरूरी है लेकिन लोग काफी संख्या में वेस्ट पैदा कर रहे हैं, क्या इसका कुछ नहीं किया जा सकता। लोग बिजली बचाने की बात तो करते हैं, पर वेस्ट बचाने के लिए कोई नहीं कहता। यानी कोई इसके रीयूज की बात नहीं कहता। बस यहीं से ये विचार आया कि कुछ ऐसा करें जिससे वेस्ट को भी रीयूज किया जाए और उसका बिजनेस में इस्तेमाल हो सके। अर्चना की इस बात का असर उनके कैफे में भी नजर आता है। यहां साइकिल के पुराने रिम, गाड़ियों के पुराने टायर, ड्रम, संदूक, अटैची और दूसरी ऐसी बेकार चीजों को जोड़कर अद्भुत ढंग और रंग से आकर्षक तथा उपयोगी बनाया गया है। यही उनके इस कैफे की यूएसपी भी बन गया है। यहां आने वाले लोग खाना भूल कर सजावट की बात करने लगते हैं।

पेड़ों के छांव में बना यह कैफे अपने सामने एक अलग दुनिया का अहसास कराता है। इसका इंटीरियर और सामने का नजारा इनोवेशन का फील देता है। अब अर्चना और स्वाति उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज और भोजन के साथ कुछ नया प्रयोग करना चाहती हैं। उनकी कोशिश है कि वे पहाड़ी खाने को प्रमोट करने के लिए कोई नया प्रोजेक्ट भी लाएं। हालांकि यह क्या होगा इसका ब्यौरा उन्होंने नहीं दिया। लेकिन दो युवतियों का पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में यह प्रयास वाकई काबिले तारीफ है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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