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कश्मीर में मार्कोस कमांडो का ऑपरेशन

मनजीत नेगी

हिल-मेल अपने पाठकों के लिए लाया है एशिया की सबसे बड़ी झील में दुनिया के बेहतरीन मार्कोस कमांडो का फुल एक्शन। पाकिस्तानी सेना और आतंकियों के नापाक गठजोड़ को नेस्तनाबूद करने के लिए भारतीय सेना और नौसेना का साझा मिशन।

आज हम आपको कश्मीर में सेना के एक ऐसे एक्सक्लूसिव अभ्यास के बारे में बताने जा रहे हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ। एक ऐसा ऑपरेशन जिसमें दुनिया के बेहतरीन कमांडो सेना की मदद से आतंकियों का सफाया करते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं नौसेना के मार्कोस कमांडो की, जो पिछले कई सालों से कश्मीर की वूलर झील की निगरानी के मिशन को अंजाम दे रहे हैं। मार्कोस कमांडोदिन और रात के वक्त 250 वर्ग किलोमीटर में फैली विशालकाय वूलर झील में आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए हाई स्पीड बोट के जरिए ऑपरेशन चलाते हैं। मार्कोस का निकनेम ‘मगरमच्छो’ है और इसका मोटो है ‘द फ्यू, द फियरलेस।’ कश्मीर के बांदीपुरा जिले में सेना की राष्ट्रीय राइफल यूनिट के साथ मिलकर नौसेना के मार्कोस कमांडो वूलर झील के आसपास के इलाके में आतंकियों के सफाए का काम करते हैं। इस खास मिशन के जरिये इस इलाके में सेना और नौसेना के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिलता है।

पाकिस्तान में आम चुनाव निपटने और नई सरकार के गठन के बाद एक बार फिर कश्मीर घाटी में आतंकियों की घुसपैठ तेज हो चुकी है। लाइन ऑफ कंट्रोल पर पाकिस्तानी सेना और आतंकियों का नापाक गठजोड़ कश्मीर घाटी के अलग-अलग इलाकों में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। ऐसे में सेना का ऑपरेशन ऑल आउट तेज हो चुका है। बांदीपुरा में लाइन ऑफ कंट्रोल से लगे गांवों में सेना दिन और रात के वक्त पेट्रोलिंग कर के आतंकियों की घुसपैठ को नाकाम कर रही है। रात के 8 बजे हम भी राष्ट्रीय राइफल की एक घातक टुकड़ी के साथ पेट्रोलिंग के लिए निकले। मिशन पर निकलने से पहले टीम कमांडर ने जवानों को जरूरी हिदायत दी। उसके बाद जंगल से लगे इलाके में पेट्रोलिंग शुरू हो गई। घातक टीम का एक ही मकसद है किसी भी हालत में आतंकियों की घुसपैठ को नाकाम करना। कुछ साल पहले एलओसी से सटे इन गावों से काफी घुसपैठ होती थी लेकिन सेना की राष्ट्रीय राइफल यूनिट की मुस्तैदी से घुसपैठ में काफी कमी आई है।

सरहद पर तैनात जवान सभी तरह के हथियारों से लैस हैं। फिर बात चाहे एके-47 राइफल की हो रॉकेट लांचर या एलएमजी की, क्योंकि हर कदम पर खतरा बना हुआ है। खासतौर से पाकिस्तान ने एक नई रणनीति के तहत एलओसी से लगे गांव के लोगों को निशाना बनाना शुरू किया है। ऐसे में सेना भी एलओसी पर आक्रामक रणनीति के तहत आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम दे रही है। इस साल अब तक पिछले आठ महीने में 14 आतंकी मारे जा चुके हैं।

अब हम आपको मार्कोस कमांडो की खासियत से रूबरू करवाते हैं। मार्कोस कमांडो मगरमच्छ की तरह ही काम करते हैं। 1000 जवानों में से एक मार्कोस कमांडो बनता है। इनकी ट्रेनिंग अमेरिका और ब्रिटेन की स्पेशल फ़ोर्स के साथ भी होती है। खास बात यह है कि इन कमांडो के पास उच्च स्तरीय हथियार और अन्य उपकरण होते हैं, जिससे यह दुश्मन तक बिना उसे भनक लगे पहुंच जाते हैं। हालांकि अपने मिशन को सही तरीके से अंजाम देने के लिए इन कमांडो को एक खास ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। मार्कोस जल, थल और वायु सभी जगह ऑपरेशन को अंजाम देने में महारत हासिल रखते हैं। अमूमन इन्हेंो समुद्री लुटेरों को खत्मज करने में लगाया जाता है लेकिन घाटी में मौजूदा हालात को देखते हुए सेना के साथ इन मार्कोस को लगाया गया है।

मार्कोस कमांडो बनने के लिए 20 साल के युवाओं का चयन किया जाता है। इसके बाद 5 सप्ताह की एक कठिन परीक्षा का दौर शुरू होता है। यह इतना कष्टकारी होता है कि लोग इसकी तुलना नर्क से भी करते हैं। इस प्रक्रिया में ट्रेनी को सोने नहीं दिया जाता है, उसे भूखा रखा जाता है और कड़ी मेहनत कराई जाती है। इस चरण में जो लोग ट्रेनिंग छोड़कर भागते नहीं हैं उन्हें ही आगे के प्रशिक्षण के लिए चुना जाता है। मार्कोस की ट्रेनिंग लगभग 3 साल तक चलती है। इस ट्रेनिंग में इनको जांघों तक कीचड में घुसकर 800 मीटर दौड़ लगानी पड़ती है और इस दौरान इनके कंधों पर 25 किलो का वजन भी रखा जाता है। इसके बाद इन जवानों को “हालो” और “हाहो” नाम की दो ट्रेनिंग को पूरा करना पड़ता है। “हालो” जंप में जवान को लगभग 11 किमी. की ऊंचाई से जमीन पर कूदना होता है जबकि “हाहो” जंप में जवान को 8 किमी की ऊंचाई से कूदना होता है। हमने वूलर झील में मार्कोस के इसी एक्शन का एक्सक्लूसिव नजारा देखा।

अब हम आपको वुलर झील के बारे में बताते हैं। वुलर झील बांदीपोरा ज़िले में स्थित है,जो लेह- श्रीनगर हाइवे से लगभग 20 से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। वुलर झील का मार्ग श्रीनगर से जुड़ा हुआ है। वूलर झील विश्व की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील मानी जाती है। यह करीब 250 वर्ग किलोमीटर में फैली है और बांदीपुरा से लेकर सोपोर तक जाती है। वुलर संस्कृत के ‘उल्लोल’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ होता है, ऊंची लहरों वाली झील। प्राचीन काल में इसे महापद्मसर कहा जाता था। इस झील की लहरें दोपहर तक लगभग शांत रहती हैं, लेकिन दोपहर के बाद उग्र रूप धारण कर लेती हैं। तुलबुल परियोजना के नाम से प्रसिद्धवुलर बैराज की परिकल्पना 1980 में की गई थी जिस पर 1984 में काम शुरू हुआ था। लेकिन पाकिस्तान के आपत्ति जताने पर 1987 में इसका काम रोक दिया गया था। पाकिस्तान मानता है कि यदि कभी भारत के साथ युद्ध होता है तो भारत अचानक इस बैराज का पानी छोड़कर पाकिस्तान के कई इलाकों को डुबो सकता है। वूलर झील से दर्जनों गांव से लगे हुए हैं और उससे आगे का इलाका हाजिन का जंगल है, जहां से आतंकी घुसपैठ की कोशिश करते हैं।

पेट्रोलिंग के दौरान जब हम आगे बढ़ रहे थे, मार्कोस कमांडो हाई स्पीड बोट पर तमाम अत्याधुनिक हथियारों के साथ सवार थे। इसी दौरान अचानक मार्कोस कमांडो को मछुआरों की संदिग्ध कश्ती नजर आई। हाई स्पीड बोट की मदद से उसको चारों ओर से घेर लिया गया। उसे अपने कब्जे में लेकर उसकी चैकिंग शुरु की गई। इस दौरान उस कश्ती में रखा गया सामान खासतौर से मछली और सिंघाड़े की जांच की जाती है। उनके पास मौजूद कागजात की जांच की गई । इस इलाके में जो मछुआरे हैं, उन्हें सेना की तरफ से एक आई कार्ड दिया जाता है। मार्कोस कमांडो का सर्च ऑपरेशन इसी तरह से 24 घंटे चलता रहता है। दिन और रात के वक्त इस विशालकाय झील में मार्कोस कमांडो लगातार पेट्रोलिंग करते रहते हैं।

अपनी पहचान छुपाने के लिए मार्कोस कमांडो दाढ़ी बढ़ाकर और चेहरे को ढक कर रखते हैं। पिछले कई सालों से वूलर झील में अपनी तैनाती से मार्कोस कमांडो ने कश्मीर घाटी के आतंकियों में अपनी दहशत कायम की है। अपने खास पहनावे और दाढ़ी की वजह से आतंकी इन्हें दाढ़ी वाला फौजी कह कर बुलाते हैं। यहां पर एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि इन कमांडो के घरवालों को भी यह पता नहीं होता कि वे कमांडो हैं।

अब बात मार्कोस के रात के एक खास ऑपरेशन की। दो हाई स्पीड बोट पर सवार होकर हम मार्कोस कमांडो के साथ रात के अंधेरे में वूलर झील की पेट्रोलिंग पर निकले। दिन के मुकाबले रात में वूलर झील की लहरों में ऑपरेशन को अंजाम देना मुश्किल होता है। लहरें शांत हैं लेकिन खतरा ज्यादा है, क्योंकि आतंकी छोटी बोट के सहारे घुसपैठ की फिराक में होते हैं। झील के आस-पास का जंगल और पेड़ की आड़ ऑपरेशन को और मुश्किल बना देता है। दिन की तरह ही रात में भी मार्कोस पूरी तेजी के साथ वूलर झील का चप्पा-चप्पा छानते हैं।

मार्कोस कमांडोज को पहले मरीन कमांडो फोर्स यानी एमसीएफ के नाम से भी जाना जाता था। मार्कोस को मुंबई पर 26/11 हमले के ऑपरेशन में भी बुलाया गया था। मार्कोस नौसेना की एक स्पेकशल ऑपरेशन यूनिट है। इसका मकसद कांउटर टेररिज्मा, डायरेक्टंर एक्श्न, अनकंवेंशनल वॉरफेयर, होस्टेनज रेस्यूका और इस तरह के खास ऑपरेशनों को पूरा करना है। 1971 में भारत और पाकिस्ता‍न के युद्ध के बाद इस बात पर जोर दिया गया कि नौसेना के पास स्पेऑशल कमांडो से लैस एक टीम होनी चाहिए। अप्रैल 1986 में नेवी ने एक मैरीटाइम स्पे‍शल फोर्स की योजना शुरू की। एक ऐसी फोर्स जो मुश्किल ऑपरेशनों और काउंटर टेररिस्टग ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें। उस समय नौसेना ने कुछ खास अधिकारियों को सेना और सिक्यो रिटी फोर्सेज के साथ शुरुआती ट्रेनिंग दिलवाई। इसके बाद तीन ऑफिसर्स को पहले यूएस नेवी सील्सट कमांडो और फिर ब्रिटिश स्पेनशल एयर सर्विस के पास एक विशेष कार्यक्रम के तहत ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। इसी तरह कुछ कमांडो आज भी जम्मूस-कश्मीकर में सेना के साथ जुड़े हुए हैं। वे इलाके में काउंटर टेररिज्म में सेना का साथ देते हैं। 1999 में हुई कारगिल जंग में भी मार्कोस ने भारतीय सेना को काफी मदद की थी।

कश्मीर में बाढ़ के दौरान भी मार्कोस कमांडो ने लोगों को बचाने में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन खासतौर से वूलर झील में अपनी तैनाती से मार्कोस कमांडो ने सेना की बड़ी मदद की है। वूलर झील सेना और नौसेना के बीच बेहतर तालमेल का शानदार उदाहरण है। पिछले कुछ समय से जम्मू कश्मीर में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को बढ़ाने की कोशिश की गई है। जहां वूलर झील में मार्कोस कमांडो तैनात हैं, वहीं पास के ही हाजिन के जंगलों में वायुसेना के गरुड़ कमांडो सेना के साथ मिलकर आतंकियों से मोर्चा ले रहे हैं। साल 2017 के दौरान कई कमांडो ने सेना के साथ मिलकर कई सफल ऑपरेशन किए जिसमें बड़ी संख्या में आतंकी मारे गए।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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