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किसानों के पास अनोखा बीज बैंक

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून

बीज से जीवन जुड़ा है। बीज से बाजार जुड़ा है। बिना बीज के अन्न नहीं मिलेगा, न भोजन मिलेगा, न जीवन बचेगा। बीज बचेगा तो जीवन बचेगा, धरती बचेगी। मतलब, यदि हम बीज को सुरक्षित नहीं रख पाए तो जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे। बाजार अपने फायदे के लिए बीजों में छेड़खानी कर रहा है। ये मूल बीज की हत्या सरीखा है। फिर बीज, अन्न, पशु, मानव सब गड्डमड्ड हो जाएंगे। इसीलिए उत्तराखंड में ‘बीज बचाओ आंदोलन’ ने जन्म लिया। जिसका मक़सद पारंपरिक बीजों की संस्कृति को बचाना था। बाजार के ज़रिये हावी हो रहे बीज, या फिर जीएम बीज की चुनौतियों से निपटना भी इसमें शामिल है।

उत्तराखंड के टिहरी ज़िले में किसान अपने परंपरागत ज्ञान के ज़रिये सदियों से चले आ रहे बीजों को न सिर्फ बचाये हुए हैं। बल्कि अपने ज्ञान और प्रयोग के ज़रिये उन्हें और बेहतर बना रहे हैं। साथ ही अच्छी फसल हासिल कर रहे हैं। बीज आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी बताते हैं कि हजारों साल से जो बीज चल के आया है, अधिक उपज देने में सक्षम हैं, जिन पर किसी तरह का कीड़ा नहीं लगता। पहाड़ में जो हमारे देसी पारंपरिक बीज हैं, उनमें से कुछ प्रजातियां कमजोर हुई हैं, लेकिन धान और गेहूं की कुछ प्रजातियां बहुत बढ़िया हैं। धान में थापाचीनी प्रजाति है जिसकी पैदावार भी अधिक होती है और इसमें कोई कीड़ा नहीं लगता। ऐसे ही काठी गेहूं, मंडुवा-मुलैठ और इस तरह की कई प्रजातियां हैं। जिनकी फसल खराब नहीं होती। इनमें कीड़ा नहीं लगता। ये जलवायु परिवर्तन को झेलने में सक्षम हैं।

बीजों पर बाजार को हावी होता देख टिहरी के जड़धार गांव के किसान विजय जड़धारी ने बीज बचाओ आंदोलन शुरू किया। उन्होंने इन प्राचीन बीजों की अनेकों प्रजातियों को आज भी संरक्षित किया हुआ है। जड़धारी के पास अपना खुद का लिविंग जीन बैंक है। जिसमें धान की करीब 350 प्रजातियां हैं। गेहूं में 30 प्रजाति, जौ में 4 प्रजाति, मंडुवा या रागी में 10-12 प्रजाति हैं। राजमा की 220 से अधिक प्रजाति का कलेक्शन है। नवरंगी दाल की 20 से अधिक प्रजाति है। स्थानीय सब्जियों के बीजों की भी कई-कई प्रजातियां हैं। टमाटर की 5-6 प्रजाति है। पहाड़ का एक खास आलू है टुंगड़ी। ये कभी सड़ता नहीं है। टुंगड़ी आलू सूख कर ड्राइड आलू में तब्दील हो जाएगा लेकिन सड़ेगा नहीं। ये देश के सबसे स्वादिष्ट आलू की किस्म में से एक है। इस तरह टिहरी के किसान अनाज और सब्जियों की विविधता को बचाए हुए हैं।

जीएम बीज की चुनौतियों से लड़ते हुए पारंपरिक बीजों को वैज्ञानिक इनपुट देने की जरूरत है। इनकी पहचान करने की जरूरत है। किसानों ने अपने स्तर पर तो इन्हें चिन्हित किया है। लेकिन यदि कृषि वैज्ञानिक भी इन पर कार्य करेंगे तो और अच्छे परिणाम हासिल होंगे।

बीज आंदोलन के प्रणेता को ये भी चिंता सता रही है कि आज विविधता की खेती नहीं हो रही। एकल खेती जहां आती है, एक खेती का ज्ञान किसी बाहरी आदमी के पास होगा तो किसान उनका गुलाम हो जाएगा। उन्हें उत्तराखंड की बारह अनाजा की परंपरा को बचाये रखने का श्रेय भी दिया जाता है। बारह अनाजा में बारह किस्म के अनाज उगाये जाते हैं। कुछ अपने लिये होते हैं, कुछ पशुओं के लिए, पर्यावरण के लिये और बाजार के लिए भी। उत्तराखंड के गांवों में आज भी किसान अपने लिये 20-25 चीजें उगा लेता है। धान, गेहूं, मंडुवा, झंगुरा उगाता है। सब्जियां भी उगाता है। मंडुवा उसके अपने इस्तेमाल के लिये हो जाता है। चौलाई बाजार में बेच सकते हैं। सोयाबीन थोड़ा खुद के लिए थोड़ा बाजार के लिए। राजमा भी बाजार जा सकता है। इससे किसान के पास अपने खाने के लिए भी पर्याप्त अन्न होता है। पशुओं के लिए भी व्यवस्था हो जाती है। साथ ही आमदनी भी।

लेकिन जैसे जैसे बाजार हावी हुआ। किसान लागत कम करने के लिए एकल फसल उगाने लगे। विजय कहते हैं किआत्महत्या वही किसान कर रहे हैं जिन्होंने एकल खेती अपनाई। खेती में मोनो कल्चर अपनाया। गन्ना उगा रहे हैं तो सिर्फ गन्ना ही उगाया या सिर्फ कपास उगा रहे। आज राजस्थान में लहसुन उत्पादक किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो इसकी यही वजह है। कोई लहसुन का कितना इस्तेमाल कर सकता है। या सिर्फ गन्ना उगाने से किसान को अपने घर की जरूरत की चीजें हासिल नहीं होंगी। महाराष्ट्र के किसान भी इसीलिए आत्महत्या करते हैं। विजय आंध्र प्रदेश के मेढक जिले का उदाहरण देते हैं। यहां लोग विविधता की खेती करते हैं, इसीलिये यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता।

आज यदि किसान को जिंदा रखना है तो खेती में लागत कम करनी पड़ेगी। किसान को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने की जगह ज़ीरो बजट एग्रीकल्चर पर आना होगा। जिसमें बीज अपने हों। खाद अपनी हो। ताकि मनुष्य, जानवर और पर्यावरण सब स्वस्थ रहें।

विजय जड़धारी कहते हैं कि बाजार में जबसे हाइब्रिड बीज आया। खाद, रसायन, कीटनाशक, बीमारी जैसी तमाम मुश्किलें भी साथ आ गईं। हाईब्रिड ने किसानों की परंपरागत खेती छीन ली। बीज किसान के हाथ से निकलकर बाज़ार में चला गया। जीएम बीज बाज़ार का ही खेल है। जिसमें किसानों की आज़ादी, उनका स्वालंबन पूरी तरह कंपनियों पर निर्भर हो जाएगा। जीएम बीज का असर पूरे पर्यावरण पर पड़ेगा। दूसरी फसलों पर भी खतरा आ जाएगा। हवा में मिलकर या मधु-मक्खियों-तितलियों के ज़रिये उसकी मिलावट दूसरी फसलों में भी होगी।

विजय जड़धारी जीएम बीजों को जबरदस्ती का सौदा बताते हैं। वे इसे बीजों के साथ छेड़खानी कहते हैं। धान से यदि धान जुड़ता है तो धान ही जोड़ा जाना चाहिए। मछली को सोयाबीन से क्यों जोड़ें। बकरी का दूध बेहतर बनाने के लिए उसमें मकड़ी के जीन्स क्यों मिलाएं। ऐसे तो फिर इंसान के जीन भी फसलों में डाल देंगे। ये पूरी प्रकृति और मानवता के लिए खतरनाक है।

उत्तराखंड के चिपको आंदोलन से मिट्टी-पानी की सीख लेकर 1980 के दशक के आखिर में ‘बीज बचाओ आंदोलन’ शुरू करने वाले विजय जड़धारी आज उन महत्वपूर्ण लोगों में से एक हैं जिन्होंने बीजों की प्राचीन संस्कृति सहेजी हुई है। उन्हें इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

किसान ही बीज से फसल उगाता है। बीज पर सबसे पहला अधिकार किसान का है। जीएम बीज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बिछाया जाल है। जिससे किसानों को बचाना समय की मांग है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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