जोशीमठ के पहाड़ पर भार ड्रेनेज प्लान पर नहीं हुआ काम

जोशीमठ के पहाड़ पर भार ड्रेनेज प्लान पर नहीं हुआ काम

जोशीमठ आदि शंकराचार्य की तपस्थली रही है। अनुमान है कि 815 ई. में यहीं पर आदि शंकराचार्य ने एक शहतूत के पेड़ के नीचे साधना कर ज्ञान प्राप्ति की थी और इसीलिए इस जगह का नाम ज्योतिर्मठ पड़ा जो बाद में धीरे-धीरे आम बोलचाल की भाषा में जोशीमठ हो गया।

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

बद्रीनाथ धाम और भारत के तीन छोरों पर मठों की स्थापना करने से पहले शंकराचार्य ने जोशीमठ में ही पहला मठ स्थापित किया था। यहीं पर शंकराचार्य ने सनातन धर्म के महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थ शंकर भाष्य की रचना भी की थी। वर्ष 2023 मे देश दुनिया के सामने भीषण आपदा के रूप मे प्रकट हुई इस त्रासदी पर जहां एक वर्ष बाद 2024 में हुए लोकसभा चुनाव की आचार सहिंता प्रभावी रही और अब विधानसभा उप चुनाव की आचार सहिंता प्रभावी है, जब जोशीमठ आपदा के बाद इस ऐतिहासिक नगर को बचाने के लिए लोकसभा चुनाव से पूर्व न केवल घोषणाऐं की जा चुकी है बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा धनराशि भी स्वीकृत की जा चुकी हो उसके बावजूद आचार सहिंता क्यों हावी है? यह किसी के गले नहीं उतर रहा। भू धसाव प्रभावित यह नहीं समझ पा रहे हैं कि लोकसभा के बाद विधानसभा उप चुनाव और इसके बाद निकाय और फिर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आचार सहिंता लगती रहेगी तो क्या जोशीमठ को यों ही आचार सहिंता के बहाने अपने हाल पर छोड़ा जा सकता है?

जोशीमठ को बचाने के लिए ट्रीटमेंट सहित अन्य कार्य करने के लिए आचार सहिंता ही प्रमुख कारण है तो क्या देश की आठ वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट के कोई मायने नहीं है? यदि जोशीमठ आचार सहिंता के कारण सुरक्षित रह सकता है तो क्यों नहीं लोगों को निर्माण कार्य करने की स्वीकृति दी जा रही है। केन्द्र सरकार की संस्थाएं तो जोशीमठ नगर क्षेत्र के अंतर्गत ही भार बढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं और धड़ल्ले से भारी भरकम निर्माण कर रहे हैं लेकिन जोशीमठ नगर पालिका या अन्य नगरवासी एक ईंट भी रखेंगे तो भार बढ़ जाएगा यह कैसा दोहरा चरित्र है?

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मूल/पुस्तेनी निवासियों के संगठन पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से भेंट कर चिन्हित डेंजर जोन से बाहर सुरक्षित भूमि पर हल्के निर्माण की अनुमति चाहने सहित कई समस्याओं पर साल 2023 में जनवरी की कड़कड़ाती ठंड में अचानक जोशीमठ के पहाड़ों के भीतर से पानी का फव्वारा फूटने के साथ ही सैकड़ों भवनों की दीवारों और फर्श पर दरारें आ गई। किसी तरह मकान खाली कराए गए। पहाड़ के लिए खतरा बने होटलों को ढहाकर मलबा हटाया गया। विभिन्न तकनीकी संस्थानों के वैज्ञानिकों की टीम ने जांच के बाद रिपोर्ट नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी को सौंपी। जिसमें पहाड़ की स्थिरता के लिए जल्द से जल्द बुनियादी काम शुरू करने की सिफारिश की गई।

सीबीआरआई रुड़की की टीम की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट में बताया गया है कि जांच के दौरान 300 मिलीमीटर तक चौड़ी और 3 से 4 मीटर तक गहराई की करीब 40 दरारें पाई गई और इन्हीं दरारों के आसपास अधिकांश भवनों को नुकसान हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार अतिसंवेदनशील भवनों में दरारों की चौड़ाई 5 मिलीमीटर से अधिक थी। जबकि मध्यम रूप से संवेदनशील भवनों में आई दरारें दो से पांच मिलीमीटर तक चौड़ी थी। भूधंसाव के दौरान जोशीमठ में 2300 से अधिक भवनों का सर्वे करने वाले सीबीआरआई वैज्ञानिक ने बताया कि जोशीमठ में 14 पॉकेट ऐसी हैं, जहां पर बने करीब 800 जर्जर भवन रेड श्रेणी में हैं। जिन्हें ध्वस्त कर मलबा पूरी तरह साफ करना है। ताकि पहाड़ के ऊपर का भार कम हो सके। यहां के लोगों का पुनर्वास अन्य जगहों पर किया जाना है। इसके अलावा करीब 700 भवनों की मरम्मत की जानी है।

रिपोर्ट के अनुसार पहाड़ पर समुचित ढंग से ड्रेनेज की व्यवस्था नहीं होने से खतरा बढ़ा है। क्योंकि बारिश और घरों का पानी दरारों के भीतर जाने से काफी नुकसान हुआ है। ऐसे में वैज्ञानिक रिपोर्ट में जर्जर भवनों को हटाने के साथ ही ड्रेनेज प्लान निर्मित करने और रिटेनिंग वॉल आदि का निर्माण जल्द से जल्द किए जाने की सिफारिश की गई है। वहीं एक साल बाद फिर मानसून आने वाला है। ऐसे में भारी बारिश होती है तो पहाड़ पर भूधंसाव का खतरा फिर से मंडरा सकता है। भूजल के अत्यधिक दोहन से भूधंसाव हुआ और कई पुराने भूस्खलन भी फिर से सक्रिय हो गए। जिससे हालत बिगड़ गए। इसके साथ ही जोशीमठ की प्रभावित चट्टानें उत्तर की झुकने से ढलान बना है। ये चट्टानें पुराने भूस्खलन के जमा मलबे से बनी हैं। मोटे दाने वाली मलबे की सामग्री भी पहाड़ और भवनों की अस्थिरता का कारण रही। जोशीमठ में इमारतों की मैपिंग, खतरनाक क्षेत्रों के आकलन और उनके कारणों की पहचान करना, हिमालयी क्षेत्र में निर्माण कार्यों का मैनुअल तैयार करना और सख्ती से पालन कराना, पहाड़ों पर भूवैज्ञानिक आधार पर सुरक्षित भूमि का मानचित्र तैयार करना, पूर्व चेतावनी प्रणाली के जरिए सतत निगरानी और आपदा का पूर्वानुमान जारी करना, ड्रेनेज प्लान एवं पहाड़ों की स्थिरता के लिए वैज्ञानिक उपाय आदि करना।

भू धसाव आपदा के कारण सीमांत धार्मिक एवं पर्यटन नगरी जोशीमठ अब “ज्योतिर्मठ” पर संकट के बादल मंडरा रहे है, लेकिन चुनावी समर मे ताल ठोक रहे दलों को शायद यह त्रासदी कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। हालांकि विपक्ष की ओर से कभी कभार जोशीमठ आपदा का जिक्र अवश्य कर लिया जाता है। तब मुख्यमंत्री ने आश्वास्त किया था कि लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद एक कमेटी का गठन किया जायेगा जिसमे संगठन के पदाधिकारियों को भी शामिल किया जाएगा और उनके सुझावों को प्राथमिकता देते हुए कार्य शुरू किए जाएंगे, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कमेटी तो नहीं बनी विधानसभा उप चुनाव की आचार सहिंता जरूर प्रभावी हो गई।

जोशीमठ भू धसाव प्रभावित जिन्हें डेंजर जोन से हटाया गया है वे किस तरह इधर उधर रहकर खाना बदोस जीवन यापन कर रहे हैं और अपनी जन्मभूमि के शहर मे शरणरार्थी की तरह गुजर बसर कर रहे हैं यह उनसे बेहतर कौन समझ सकता है? लेकिन सरकारें क्यों नहीं समझ पा रही है। देखना होगा कि अब उप चुनाव के बाद ही सही क्या निकाय चुनाव की आचार सहिंता से पूर्व जोशीमठ के भविष्य को लेकर कोई ठोस निर्णय होगा? इस पर 17 महीनों से भू धसाव त्रासदी का दंश झेल रहे प्रभावितों की नजरें रहेंगी।

हिमालयी क्षेत्र में बहुमंजिला इमारतों के निर्माण में हमारे नए इंजीनियरिंग तरीके प्रतिकूल साबित हो सकते हैं। इलाके की वहन क्षमता को ध्यान में रखकर बनाई गई एक कार्यान्वयन योजना समय की जरूरत है। हमें इस क्षेत्र की निगरानी जारी रखनी चाहिए और पिछली दुर्घटनाओं व आपदाओं से सीखना चाहिए। हमें संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप को कम करने के लिए योजनाएं तैयार करनी चाहिए। विकास के नाम पर हम जो कर रहे हैं, उसे भी रोकना होगा। सरकार का तर्क है कि ढांचागत विकास से रोजगार बढ़ेगा, लेकिन इस क्षेत्र में इसके विपरीत प्रभाव पड़ रहे हैं। लोग अपनी आजीविका और घरों को खो रहे हैं। बिना सोचे समझे किए गए विकासात्मक गतिविधियों के गंभीर परिणाम होते हैं और हमें उनके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और वह दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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