हिल-मेल ब्यूरो उत्तराखंड के बेटे-बेटियों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत करने का सिलसिला इस बार भी जारी रहा। इस बार सरकार ने मशहूर पर्वातारोही बछेंद्री पाल को पद्म भूषण अलंकरण से सम्मानित किया। भारत सरकार द्वारा जारी पद्म भूषण पुरस्कार की सूची में बछेंद्री एकमात्र
हिल-मेल ब्यूरो
उत्तराखंड के बेटे-बेटियों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत करने का सिलसिला इस बार भी जारी रहा। इस बार सरकार ने मशहूर पर्वातारोही बछेंद्री पाल को पद्म भूषण अलंकरण से सम्मानित किया। भारत सरकार द्वारा जारी पद्म भूषण पुरस्कार की सूची में बछेंद्री एकमात्र खिलाड़ी हैं। वहीं जागर गायन को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने वाले जागर गायक प्रीतम भरतवाण और प्रख्यात फोटोग्राफर अनूप साह को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
सुश्री बछेंद्री पाल, पर्वतारोही
बछेंद्री पाल को यदि पर्वत पुत्री कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बपचन से ही पहाड़ों पर चढ़ने और उतरने की मजबूरी एक दिन बछेंद्री को एवरेस्ट जैसी ऊंचाई पर ले जाएगी, यह शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। विश्व की अनेक चोटियां पर आरोहण करने के बाद बछेंद्री ने 23 मई, 1984 के दिन दोपहर एक बजकर सात मिनट पर जब माउंट एवरेस्ट की चोटी को चूमा तो वह विश्व के इस सबसे ऊंचे पर्वत पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बन गई।
साहसिक कार्यों के लिए बछेंद्री पाल को अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया । इनमें अर्जुन पुरस्कार, नेशनल एडवेंचर अवार्ड, नेशनल यूथ अवार्ड, आई एमएफ द्वारा स्वर्ण पदक, शिक्षा विभाग द्वारा स्वर्णपदक, कोलकाता लेडीज स्टडीज ग्रुप अवार्ड जैसे पुरस्कार शामिल हैं। सन 1985 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया। बछेंद्री ने अपना नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी दर्ज करवाया। गढ़वाल विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने ‘मेरी शिखर यात्रा’ पुस्तक भी लिखी, जो एवरेस्ट यात्रा पर आधारित है।
बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई 1954 को उत्तरकाशी जिले के नकुरी गांव में एक भोटिया जनजातीय परिवार में हुआ था। पिता किशन सिंह भी आम भोटिया परिवारों की तरह छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे। इनके परिवार गर्मियों में हर्सिल चले जाते थे और सर्दियों में नकुरी। इन पहाड़ों पर चढ़ने और उतरने के अभ्यास ने बछेंद्री को मजबूत बनाया। सिलाई और दूसरे ऐसे की काम करके बछेंद्री अपना खर्चा निकाल कर पढ़ाई करती रही और डीएवी कालेज देहरादून से संस्कृत में एमए उत्तीर्ण किया। फिर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी जाकर प्रशिक्षण लेने लगी। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने गंगोत्री और माणा सहित कई चोटियों पर चढ़ाई की।
प्रीतम भरतवाण, जागर एवं लोकगायक
जागर और पांवड़े उत्तराखंड की संस्कृति अभिन्न अंगर हे हैं, बल्कि कहा जाए कि इनके बिना गढ़वाल की संस्कृति अर्थहीन हो जाएगी तो गलत न होगी। एक ऐसे दौर में जब कि यहां का जनमानस जागर और पंवाड़ों से विमुख होने की कगार पर था, प्रीतम भरतवाण ने जागर और पंवाड़ों के कई कैसेट निकालकर और कई मंचों पर उन्हें गाकर एक बार फिर से जनमानस का इन विधाओं से परिचय करवाया। प्रीतम भरतवाण जागर और पंवाड़ों को अपने गायन में शामिल न करते तो इनका अस्तित्व खत्म होना तय था।
लगातार अपेक्षित होते जा रहे ढोल को लेकर भी प्रीतम भरतवाण ने कार्य किया, नतीजा यह है कि आज ढोल दमाऊं का दौर लौटा है। उत्तराखंड में पंवाड़ों के रूप में प्रचलित लगभग सभी वीरगाथाओं और प्रणयगाथाओं पर वह गीत गा चुके हैं। अपने एल्बम में ढोल का प्रयोग करने के साथ ही उन्होंने ढोल प्रशिक्षण के लिए एक पाठ्यक्रम भी तैयार किया है। वह दुबई, ओमान, जर्मनी, हॉलैंड और अमेरिका में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। उनके गीतों की एक पुस्तक ‘सुर्जकांठ्यों’ भी प्रकाशित हुई है। अगर कहें कि जागर गायन को वैश्विक पहचान दिलाने में सबसे ज्यादा परिश्रम प्रीतम भरतवाण का है तो अतिश्योक्ति न होगी। उन्हें हाल ही में दून विश्वविद्यालय ने डीलिट की मानद उपाधि प्रदान की है।
1988 में प्रीतम भरतवाण ने सबसे पहले ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाई। 1995 में प्रीतम भरतवाण की कैसेट तौंसा बौं निकली। इस कैसेट को जनता ने हाथों-हाथ लिया। प्रीतम भरतवाण को सबसे अधिक लोकप्रियता उनके गीत सरूली मेरू जिया लगीगे गीत से मिली। उन्हें उत्तराखंड विभूषण, भागीरथी पुत्र, जागर शिरोमणि, सुर सम्राट, हिमालय रत्न जैसे कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
अनूप साह, फोटोग्राफर
पद्मश्री पुरूस्कार से सम्मानित किए गये फोटोग्राफर अनूप साह का पूरा जीवन फोटोग्राफी, पर्वतारोहण, पर्यावरण संरक्षण को समर्पित रहा। उनके 3500 से ज्यादा फोटोग्राफ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में चयनित हुए। करीब 350 फोटो पुरस्कृत हुए। साह छह दुर्गम चोटियों पर सफल आरोहण कर चुके हैं। वह कई ट्रैकिंग अभियानों में शामिल रह चुके हैं। 1970 में 6611 मीटर ऊंची दुर्गम अविजित चोटी नंदाखाट को सर्वप्रथम अनूप ने ही फतह किया था।
इसके अलावा ट्रेल पास को भी 53 वर्षों के अंतराल के बाद 2004 में साह ने फतह किया था। साह अत्यंत प्रतिष्ठित आईएमएफ के स्थायी सदस्य और इंडियन इंटरनेशनल फोटोग्राफिक काउंसिल के उपाध्यक्ष भी हैं। इंडो-जापान नंदा देवी संयुक्त अभियान में भी वे शामिल रहे। वह अस्कोट-आराकोट 1990 और 2002 में कैलाश मानसरोवर यात्रा भी कर चुके हैं।
बेहद सौम्य, शांतचित्त शाह का जन्म 1949 में आठ अगस्त को नैनीताल में हुआ था। शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई। वह उत्तराखंड हिमालय, यहां की वनस्पतियों, जैव विविधता के सही अर्थ में इनसाइक्लोपीडिया हैं। शाह समय समय पर उत्तराखंड के बुग्यालों, घाटियों, वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों, संरक्षित जीव-जंतुओं के अवैध शिकार के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ चुके हैं। उन्होंने अपने समाजसेवी पिता स्व. चंद्रलाल शाह ठुलघरिया के साथ नैनीताल माउंटेनियरिंग क्लब, 1985 में फ्लोरिस्ट लीग की स्थापना में योगदान दिया। साह के खींचे चित्रों पर राजभवन की कॉफी टेबल बुक सहित राज्य के प्रमुख संस्थानों के दर्जनों कैलेंडर भी बन चुके हैं। पद्मश्री शेखर पाठक के साथ उनकी पुस्तक कुमाऊं हिमालय टेंपटेशन भी प्रकाशित हुई है।
अनूप साह ने 1964 में अपने पिता द्वारा दिए गए आगफा बॉक्स कैमरे से शौकिया तौर पर फोटोग्राफी शुरू की जो बाद में उनके पर्वतारोहण, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों की जानकारी के प्रति शौक के साथ जुड़ कर तेजी से परवान चढ़ी। साह के चित्रों में भी पर्वत शिखरों, प्राकृतिक दृश्यों, जीवों, वनस्पतियों, लोक परंपराओं की अधिकता है।







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