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स्वच्छ उत्तराखंड : कहां हो रही चूक?

हिल-मेल ब्यूरो 70 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र, हिमालयी ग्लेशियर, नदियों के उदगम, प्राकृतिक जलस्रोतों वाले राज्य उत्तराखंड का स्वच्छता के मानदंडों पर खरा न उतरना, न सिर्फ एक राज्य के तौर पर, बल्कि प्रकृति और पर्यटन के लिहाज से भी नुकसानदेह है। जब हम

हिल-मेल ब्यूरो

70 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र, हिमालयी ग्लेशियर, नदियों के उदगम, प्राकृतिक जलस्रोतों वाले राज्य उत्तराखंड का स्वच्छता के मानदंडों पर खरा न उतरना, न सिर्फ एक राज्य के तौर पर, बल्कि प्रकृति और पर्यटन के लिहाज से भी नुकसानदेह है। जब हम अपनी हरियाली के बूते दिल्ली में ग्रीन बोनस की मांग करते हैं, तो ये हमारी जिम्मेदारी बन जाती है कि हम हरियाली के मानकों पर खरे हों। जिसका सीधा संबंध स्वच्छता से है। यहां गंदगी का मतलब है नदियों, जंगल और इको सेंसेटिव जोन में कचरा फैलना।

स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 में उत्तराखंड के लोग और व्यवस्था क्यों पिछड़ गई है, ये भी समझने की कोशिश करनी होगी। क्योंकि सफाई सिर्फ कूड़ा उठाने और उसे कचरे के डिब्बे, कचरे की गाड़ी और फिर ट्रेंचिंग ग्राउंड में पलटने से नहीं होगी। न सिर्फ नीतियों का बखान करने से। स्वच्छता सर्वेक्षण बताता है कि हमें अपने कचरे का प्रबंधन करने के लिए त्वरित गति से कार्य करना होगा।

स्वच्छता सर्वेक्षण 2019

केंद्रीय शहरी और आवास मंत्रालय के मुताबिक विश्व के सबसे बड़े स्वच्छता सर्वेक्षण में देश के एक लाख से अधिक आबादी वाले 4237 शहरों को कवर किया गया। सर्वेक्षण का कार्य 28 दिनों तक चला। सर्वेक्षण को पूरी तरह डिजिटाइज़ और पेपरलेस रखा गया। सर्वेक्षण में शामिल शहरों ने 4.5 लाख से अधिक दस्तावेज अपलोड किये। 41 लाख जियो टैग्ड तस्वीरें क्षेत्रों से क्लिक की गईं। आम लोगों की बड़ी संख्या में भागीदारी रही। 64 लाख नागरिकों से फीडबैक लिया गया। सर्वेक्षण के लिए सोशल मीडिया पर 4 करोड़ लोगों तक पहुंचने का दावा किया गया।

स्वच्छ सर्वेक्षण -2019 में उत्तराखंड के सभी निगम, पंचायत, कैंटोमेंट बोर्ड की रैकिंग पिछली बार की तुलना में कम हुई है। कुल 5000 अंकों के इम्तिहान में उत्तराखंड के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में रुड़की को 281वां (1908.99 अंक) स्थान मिला। काशीपुर(1736.24 अंक) 308वें स्थान पर रहा। हल्द्वानी(1524.81 अंक) 308वें स्थान पर, हरिद्वार(1380.72 अंक) 376वें स्थान पर, देहरादून(1342.53 अंक) 384वें स्थान पर और रुद्रपुर(1207.58 अंक) 403वें स्थान पर रहा।

काशीपुर को छोड़कर इन सभी शहरों की रैंकिंग पिछले वर्ष के स्वच्छता सर्वेक्षण की तुलना में घट गई। रुड़की पिछले वर्ष 158वें स्थान पर, काशीपुर 310वें स्थान पर, हल्द्वानी 251वें स्थान पर, हरिद्वार 205वें स्थान पर, देहरादून 257वें स्थान पर, रुद्रपुर 281वें स्थान पर था।

उत्तराखंड के कैंट बोर्ड की स्थिति में बहुत गिरावट आई है। पिछले वर्ष दूसरे स्थान पर रहे अल्मोड़ा की रैंकिंग इस वर्ष 11वें स्थान पर रही। रानीखेत तीसरे स्थान से 13वें स्थान पर आ गया। नैनीताल छठे स्थान से 27वें स्थान पर आ गया। क्लेमेंटटाउन 16वें से 54वें स्थान पर आ गया और देहरादून 18वें से 19वें स्थान पर पहुंच गया।

गौचर ने बढ़ाया मान

जब राज्य के ज्यादातर शहरों ने स्वच्छता के मानकों पर निराशा दी, उस समय चमोली के गौचर ने स्वच्छ सर्वेक्षण में सर्वश्रेष्ठ गंगा टाउन का अवार्ड जीत कर राज्य का मान बढ़ाया। इस अवार्ड के लिए गंगा किनारे स्थित शहरों का पर्यवेक्षकों ने खुद निरीक्षण किया और इसी आधार पर नंबर दिये। जिसमें गंगा टाउन के रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल, एयरपोर्ट और उससे लगे क्षेत्रों की स्वच्छता का निरीक्षण किया गया। इसके अलावा सार्वजनिक और सामुदायिक शौचालयों की स्वच्छता, सब्जी-फल-मीट बाजार की साफ-सफाई का पर्यवेक्षकों ने निरीक्षण किया। चूंकि गंगा किनारे बसे शहरों में बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं, इसलिए इस अवार्ड केटेग्री में सर्विस लेवल प्रोग्रेस के दस्तावेज़ों पर मिले स्कोर को वरीयता नहीं दी गई। इस सर्वेक्षण में गंगा की सफाई को नहीं, बल्कि गंगा किनारे शहरों की साफ-सफाई पर नंबर दिये गये।

गंगा किनारे बसे नगरों के सर्वेक्षण में उत्तराखंड के गौचर को सबसे अधिक साफ-सुथरा पाया गया। चमोली जिले के कर्णप्रयाग तहसील में स्थित गौचर एक छोटा सा कस्बा है। स्वच्छता सर्वेक्षण समारोह में गौचर की नगर पंचायत अध्यक्ष अरुणा बेंजवाल ने राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार लिया।

ठोस कचरा प्रबंधन में स्थिति चिंताजनक

पिछले वर्ष केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया कि ठोस कचरा प्रबंधन के मामले में उत्तराखंड देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। क्योंकि इसके पास एक भी क्रियाशील ठोस कचरा प्रबंधन प्लांट नहीं है, न ही सैनेटरी लैंडफिल। हालांकि उस समय तक देहरादून के शीशमबाड़ा प्लांट ने कार्य करना शुरू नहीं किया था। रिपोर्ट में कहा गया कि राजधानी देहरादून समेत अन्य शहरों में कचरा उठाने और फेंकने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। जबकि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्य इस मामले में फिर भी बेहतर स्थिति में हैं।

वर्ष 2018 में ही केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि उत्तराखंड में प्रतिदिन 1400 मीट्रिक टन कूड़ा उत्पन्न होता है, इनमें से ज्यादातर बिना ट्रीटमेंट के डंप कर दिया जाता है। सिर्फ 20 फीसदी कचरे को ही ट्रीट किया जा पाता है। नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही इस मुद्दे पर राज्य सरकार को सख्त निर्देश दे चुके हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद राज्य सरकार हरकत में आई। राज्य में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट-2016 को लेकर नियमावली तो अस्तित्व में थी, लेकिन एक्शन प्लान के तहत। फिर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की नीति का मसौदा तैयार किया गया। नीति के अनुसार सभी 92 नगर निकायों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन पर फोकस किया जाएगा। सभी निकायों में जैविक कचरे से खाद बनाने के साथ ही बिजली भी बनाई जाएगी।

शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने बताया कि राज्य में फीसदी डोर टु डोर कूड़ा इकट्ठा किया जा रहा है। कूड़े को अलग-अलग सेग्रीगेट करने की व्यवस्था 50 फीसदी है। लेकिन उत्तरकाशी जैसी कई जगहें हैं जहां कूड़ा फेंकने के लिए ज़मीन ही उपलब्ध नहीं है। मदन कौशिक कहते हैं कि ऐसी जगहों पर ज़मीन तलाशी जा रही है। मदन कौशिक ने कहा कि राज्य वेस्ट टु एनर्जी पॉलिसी पर कार्य कर रहा है। जिसके तहत देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंहनगर में कूड़े से बिजली बनाने के लिए कार्य किया जा रहा है।

हालांकि अब भी डोर टु डोर कचरा उठाने का कार्य सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। देहरादून के रायपुर क्षेत्र की निवासी मनोरमा उनियाल कहती हैं कि डोर टु डोर कूड़ा उठाने की गाड़ी कई-कई दिनों में आती है। कई बार तो एक हफ्ते से भी अधिक समय के अंतराल पर। बरसात के दिनों में तो स्थिति और मुश्किल हो जाती है। हम अपने घर का कचरा कहां रखें। इसीलिए जहां ये लिखा होता है कि कृपया यहां कचरा न फेंके, उसी के नीचे आपको कचरे के ढेर मिल जाएंगे। वो कहती हैं कि कचरा उठाने की गाड़ी हर रोज़ आनी चाहिए।

फॉरवर्ड प्लानिंग बनानी होगी

पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के डॉ रवि चोपड़ा कहते हैं उत्तराखंड के शहरों के लिए फॉरवर्ड लुकिंग प्लानिंग की जरूरत है। उनके मुताबिक राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर भी पलायन हो रहा है। जिससे नगर निकायों पर दबाव बढ़ गया है। नगर निकाय पहले से ही कमज़ोर स्थिति में हैं। पिछले वर्ष परिसीमन के बाद देहरादून नगर निगम में ही वार्डों की 60 से बढ़कर 100 हो गई। इसके साथ ही वे नगर निकायों को अपनी आय बढ़ाने के तरीकों पर भी ध्यान देने को कहते हैं वे दून के वाटरशेड मैनेजमेंट निदेशालय के ठीक बगल में बने कूड़ेदान का उदाहरण देते हैं। जो तमाम कोशिशों के बावजूद कभी साफ़ नहीं हो पाया।

डॉ चोपड़ा कहते हैं कि स्वच्छता सिर्फ सरकार की ही ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि ये समाज की भी जिम्मेदारी है। लोगों को ये समझना होगा कि कचरा कूड़ेदान में ही डालें, कूड़ेदान के पास नहीं। वे मानते हैं कि लोगों को स्वच्छता के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए सही प्रचार और जरूरी उपाय किये जाने चाहिए।

स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 पर सवाल भी

पर्यावरण क्षेत्र की अग्रणी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट यानी सीएसई ने दावा किया है कि स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 में शहरों की रैंकिंग में कई ख़ामियां मिली हैं। सीएसई के मुताबिक पिछले वर्ष के 66 दिनों की तुलना में इस वर्ष मात्र 28 दिनों में ही सर्वेक्षण के ज़मीनी स्तर पर आंकलन का कार्य किया गया। इस जल्दबाज़ी के चलते शहरों की रैंकिंग सही नहीं हुई है।

स्वच्छ सर्वेक्षण के अन्य अहम बिंदु

6 मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वच्छ सर्वेक्षण अवारड दिये। इंदौर लगातार तीसरे साल भारत के सबसे साफ-सुथरे शहरों की सूची में अव्वल नंबर पर रहा। स्वच्छ राजधानी वर्ग में भोपाल पहले स्थान पर रहा। छत्तीसगढ़ को बेस्ट परफॉर्मेंस स्टेट अवार्ड से नवाजा गया। 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में अहमदाबाद और पांच लाख से कम आबादी वाले शहरों में उज्जैन पहले स्थान पर रहे।

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