पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का क्रांतिकारी स्रोत है हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल। डॉ. रवींद्र कुमार कोटनाला के नाम 411 से अधिक पेपर्स या पेटेंट दर्ज हैं। प्रांजल धर विज्ञान के क्षेत्र में पर्यावरण और ऊर्जा इक्कीसवीं शताब्दी की निसंदेह दो महत्वपूर्ण चिंताएं हैं, जिनके समाधान के लिए
पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का क्रांतिकारी स्रोत है हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल। डॉ. रवींद्र कुमार कोटनाला के नाम 411 से अधिक पेपर्स या पेटेंट दर्ज हैं।
प्रांजल धर
विज्ञान के क्षेत्र में पर्यावरण और ऊर्जा इक्कीसवीं शताब्दी की निसंदेह दो महत्वपूर्ण चिंताएं हैं, जिनके समाधान के लिए समूचे विश्व के वैज्ञानिक भांति-भांति के अनुसंधानों में जी-जान से लगे हुए हैं। हम सभी जानते हैं कि कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के परंपरागत स्रोत हैं। ये परंपरागत स्रोत गैर-नवीकरणीय प्रकार के हैं क्योंकि इन स्रोतों के एक बार समाप्त हो जाने के बाद इनका नवीकरण नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त दहन की अपनी प्रक्रिया के दौरान ये गैर-नवीकरणीय स्रोत पर्यावरणीय प्रदूषण फैलाते हैं। यह बात अलग है कि इनमें से प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा संसाधन है जो प्रायः ‘तरल सोना’ कहे जाने वाले पेट्रोलियम के साथ या कई बार अलग भी पाई जाती है। इन परंपरागत स्रोतों में प्राकृतिक गैस का महत्व वैश्विक स्तर पर इसलिए बढ़ा है क्योंकि यह अन्य परंपरागत स्रोतों की तुलना में कार्बन-डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करती है और इस प्रकार ग्रीन हाउस प्रभाव को कम करते हुए ओजोन परत को कम क्षति पहुंचाती है। इसीलिए प्राकृतिक गैस को ऊर्जा का पर्यावरण-अनुकूल स्रोत माना जाता है। परंतु कल्पना कीजिए कि यदि हमें ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत मिल जाए, जो पर्यावरण को किसी प्रकार की कोई क्षति ही न पहुंचाता हो, जो किसी तरीके का कोई प्रदूषण न फैलाता हो, जिस स्रोत के समाप्त होने की कोई आशंका या चिंता ही न हो, जो ग्रीन एनर्जी यानी हरित ऊर्जा का एक विश्वसनीय स्रोत हो तो क्या यह किसी क्रांति या जादू से कम होगा!
विज्ञान, ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में ऐसी ही एक क्रांति की है हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल (एचईसी) ने। हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल विश्व को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. रवींद्र कुमार कोटनाला और उनकी शिष्या डॉ. ज्योति शाह की देन है। इसका आविष्कार नैनोसाइंस के विद्वान डॉ. कोटनाला ने सन् 2015 में किया। डॉ. कोटनाला लंबे समय से संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और भारत में सर्वाधिक प्रतिष्ठित जर्नल्स में सह-संपादक का कार्य भी कर रहे हैं। डॉ. कोटनाला नेशनल अकादेमी ऑफ़ साइंसेज़ के फेलो हैं और एशिया-पैसिफिक एकेडमी ऑफ़ मैटीरियल्स के आउटस्टैंडिग एकेडमीशियन भी। 411 से अधिक पेपर्स या पेटेंट उनके नाम दर्ज हैं और जहां तक उनके शोधपत्रों के उल्लेखों की बात है तो ये उल्लेख एक साल में ही प्रायः एक हजार से अधिक हो जाते हैं, जो अपने आप में बहुत दुर्लभ तथ्य है और एक रिक़ॉर्ड भी। नैनोटेक्नोलॉजी के जिन जर्नल्स में छपना किसी भी वैज्ञानिक के लिए गर्व की बात होती है, वहां डॉ. कोटनाला के न जाने कितने पेपर्स प्रकाशित हो चुके हैं। इनके प्रकाशन की एक देशभक्ति भी है। इनके सारे प्रकाशन भारतीयों के साथ हैं, न कि किसी विदेशी वैज्ञानिक के साथ। ऐसा करने के संबंध में वे कहते हैं कि, “मैं प्राचीन जगद्गुरु भारत को दुनिया में सबसे आगे ले जाना चाहता हूं।” देश-विदेश की अनेक बेहद महत्वपूर्ण संस्थाओं से सर्वोच्च सम्मान पा चुके डॉ. कोटनाला ने हरित ऊर्जा के स्रोत एचईसी के आविष्कार हेतु एक ऐसा नैनोपोरस पदार्थ बनाया जिसमें ऑक्सीजन की कमी उत्पन्न की गई। इस पदार्थ को बनाने में चौदह वर्ष लगे। यह नैनोपोरस पदार्थ ऐसा इसलिए बनाया गया ताकि ऑक्सीजन की कमी से युक्त यह विशिष्ट पदार्थ जल (साधारण पानी) के अणु को विखंडित कर सके और विखंडन के बाद हाइड्रोजन आयन व हाइड्रॉक्साइड आयन को पैदा कर सके। रसायन विज्ञान के सिद्धान्तों के मुताबिक हाइड्रोजन आयन की चालकता जल के अणु के साथ ही होती है, जो हाइड़्रोनियम आयन यानी एचथ्रीओप्लस कहलाता है।
पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा के इस क्रान्तिकारी स्रोत यानी हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल की क्रियाविधि (मैकेनिज्म) क्या है? इस क्रियाविधि के निर्माण में वैश्विक स्तर पर भारत का मस्तक ऊँचा करने वाले डॉ. कोटनाला ने सबसे पहले मैग्नीशियम फेराइट बनाया। यह मैग्नीशियम फेराइट इस हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल में मुख्य और आधारिक भूमिका निभाता है। यह जल के अणु को आयनों में विभाजित कर देता है। ये आयन चांदी के कैथोड और जिंक के एनोड पर एकत्रित होते हैं। इस विधि में एक वोल्ट के बराबर विभव (पोटेंशियल) और चालीस मिलीएंपियर के बराबर की धारा एक छोटे एचईसी में उत्पन्न हो जाती है। इस तरह विद्युत उत्पादन से हम एलईडी बल्ब, टेबल लैंप, पंखे आदि को ऊर्जा देकर चलाते हैं। ऐसे कई हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लेट्स का इस्तेमाल करके देश के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में यह सुविधा पहुंचाई जा सकती है कि वहां रोशनी हो सके या आज की भाषा में कहें, तो संचार के एक महत्वपूर्ण साधन, मोबाइल फोन की चार्जिंग इत्यादि भलीभांति संपन्न हो सके। इसके अतिरिक्त एचईसी से टेबल लैंप जलाया जा सकता है, पंखे चलाए जा सकते हैं और बहुत सारे जनकल्याणकारी कामों में इसका सार्थक उपयोग किया जा सकता है। जब बहुत सारे हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल्स को आपस में जोड़ दिया जाता है तो जल की महज कुछ बूंदों से ही विद्युत की पर्याप्त मात्रा उत्पादित कर ली जाती है।
जब जल से विद्युत उत्पन्न करने की बात आती है तो हम सबके मन में जलविद्युत यानी बांध बनाकर बिजली उत्पादन करने के यंत्रों का चित्र उभरता है। परंतु यह उल्लेखनीय है कि डॉ. कोटनाला द्वारा आविष्कृत इस तरीके की विद्युत जल की गति के कारण नहीं उत्पन्न होती, बल्कि यह तो स्थिर जल से और वह भी स्थिर जल की बहुत थोड़ी-सी ही मात्रा से पैदा की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यहां गतिज ऊर्जा का कोई समीकरण नहीं मौजूद है और न ही किसी तरीके का कोई बांध वगैरह बनाने की आवश्यकता है। यह बात तब और प्रासंगिक हो जाती है, जब हम इस तथ्य पर विचार करते हैं कि बांधों के कारण विस्थापन और पुनर्वास की समस्याएं बहुत जटिल होती चली गई हैं। यह सुखद है कि हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल ऐसी किसी भी समस्या को कभी जन्म नहीं देता। बल्कि, इसके उलट, यह तो अनेक ऐसी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है, जिनसे आज हरेक देश और प्रत्येक महाद्वीप जूझ रहा है।
जहां सौर ऊर्जा के साथ परेशानी यह है कि शीतोष्ण कटिबंधीय और ध्रुवीय भौगोलिक क्षेत्रों में सूरज बहुत दिनों तक दिखता ही नहीं, दिखता भी है तो उसकी किरणें वहाँ पृथ्वी पर लम्बवत न पड़कर, तिरछी पड़ती हैं, इसलिए इन इलाकों में सौर ऊर्जा की मात्रा बहुत ही कम हो जाती है। जबकि हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल पृथ्वी के किसी भी कोने पर समान रूप से ऊर्जा उत्पन्न करता है, चाहे वह साइबेरिया, आइसलैंड या अलास्का का दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र हो या फिर अफ्रीकी देशों जैसा कोई ऊष्ण कटिबंधीय इलाका। इसी तरह पवन ऊर्जा की बात करें, तो दुनिया के बहुत कम देशों में ही पवन की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। पवन की गति भी पवन-ऊर्जा की परियोजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह गति महाद्वीपों के सीमान्त भौगोलिक इलाकों में तो मिल भी सकती है लेकिन जो देश विभिन्न महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में अवस्थित हैं, वहां पवन की गति की समस्या बरकरार है। इसके अतिरिक्त सूरज या पवन को एक जगह से दूसरी जगह तक ले नहीं जाया जा सकता, जबकि डॉ. कोटनाला द्वारा आविष्कृत एचईसी एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने-ले जाने में आसान है और मानव ही नहीं, बल्कि प्राणिमात्र की सेहत और सम्पूर्ण पारिस्थितिकीय तन्त्र के लिए पूर्ण रूप से सुरक्षित भी है।
नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में नाभिकीय अथवा आणविक ऊर्जा एक विकल्प के रूप में सामने जरूर आया है लेकिन ऐसी ऊर्जा खतरनाक विकिरण पैदा कर सकती है और चर्नोबिल की या जापान की फुकुशा जैसे संयन्त्रों की विनाशकारी दुर्घटनाएं इसकी ज्वलंत प्रमाण हैं। डॉ. कोटनाला द्वारा आविष्कृत यंत्र और कार्यविधि एक तो दुर्घटनाओं की आशंकाओं से मुक्त है और दूसरे यह प्रदूषण की समस्या से भी इसलिए मुक्त है क्योंकि एचईसी में सिर्फ पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जल के अलावा न तो किसी अम्ल का और न ही किसी क्षार का कोई इस्तेमाल होता है। जल चक्र की पूरी सैद्धांतिकी यहां समझ ली गई है। इसीलिए एचईसी नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक अनूठा विकल्प साबित हुआ है। पर्यावरण के संरक्षण में एचईसी की बहुत बड़ी भूमिका है क्योंकि इसमें न तो कोई विषैली या खतरनाक गैस और न ही किसी तरीके की कार्बन डाई आक्साइड या कोई अन्य प्रदूषणकारी गैस इससे उत्सर्जित होती है। यहां ध्वनि प्रदूषण भी नदारद है क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी तरह का कोई शोर ही नहीं पैदा होता। शोर की तो बात ही छोड़ दीजिए, ज़रा-सी आवाज़ भी नहीं होती इस पूरे विद्युत-उत्पादन में। यहां तक कि एचईसी की इस क्रियाविधि के जो उप-उत्पाद (बाईप्रोडक्ट्स) हैं, उनकी भी बहुत महत्वपूर्ण उपयोगिताएं हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन गैस (स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत) एवं जिंक हाइड्रॉक्साइड (सर्जिकल ड्रेसिंग में उपयोगी, परिधानों को रंगने में उपयोगी, छोटे कीटाणुओं आदि को मारने में उपयोगी यानी कीटनाशक) जैसे उप-उत्पाद।
यह हाइड्रोइलेक्ट्रिक सेल कमरे के तापमान पर कार्य करता है, यह इसकी अतिरिक्त खूबी है। बाहर से इसे गरम करने का या ठंडा करने की या फिर किसी भी अन्य रूप में इस सेल को कोई ताप या ऊर्जा देने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती; जैसे – इसे प्रकाश देने की या धूप में सेंकने आदि की कोई जरूरत ही नहीं है। व्यापक और क्रांतिकारी परिवर्तन की अग्रदूत बनी इस एचईसी को बनाने के लिए एक विशेष किस्म के पाउडर को उच्च दाब के अंतर्गत संपीडित करके ईंट के रंग वाली पतली ठोस चादर की शक्ल में ढाल लिया जाता है। यह चादर असल में फेराइट नामक एक भंगुर पदार्थ की बनी होती है जिसे चार इंच या दो इंच की भुजा वाले वर्गाकार चादर की शक्ल में क्रमशः तोड़ या काट लिया जाता है जो कि वास्तव में एक बहुत ही नाजुक और कठिन प्रक्रिया है। इस चादर को अनेक आकारों और आकृतियों में डॉ. कोटनाला ने ढाला है, जैसे – वर्गाकार, आयताकार, वृत्ताकार यानी सिक्के की तरह या फिर अंगूठियों और छल्लों की तरह। बहुत सारी चादरों और अनेक सेल्स को जोड़कर प्रचुर मात्रा में बिजली यानी ऊर्जा पैदा की जा सकती है।
यह भी एक संयोग ही है कि डॉ. कोटनाला का जन्म भी, महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री की ही तरह, दो अक्तूबर को ही हुआ। दो अक्तूबर सन् 1957 को उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कोटनाली नामक गांव में जन्मे डॉ. कोटनाला ने सन् 1982 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली से सिलिकन सोलर सेल में पीएचडी की डिग्री हासिल की। स्पष्ट है कि वे प्रारम्भ से ही ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों की खोज में व्याकुल रहे। डॉ. कोटनाला सन् 1982 में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) में वैज्ञानिक नियुक्त हुए और तब से लगातार ऊर्जा के वैकल्पिक, बेहतर और पर्यावरण-अनुकूल स्रोत की खोज में लगे रहे। देखा जाए, तो वैज्ञानिक, साहित्यकार या कलाकार कभी सेवानिवृत्त नहीं होते, लेकिन लौकिक-औपचारिक भाषा में कहा जाए तो कुछ ही महीनों पहले सेवानिवृत्त हुए डॉ. कोटनाला अत्यंत प्रतिष्ठित राजा रमन्ना फ़ेलोशिप के अन्तर्गत अपने कामकाज को और भी अधिक परिष्कृत कर रहे हैं।
डॉ. कोटनाला का मानना है कि कलाकार ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, कला त्यों-त्यों जवान होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो अच्छे से बेहतर और बेहतर से बेहतरीन करने की गुंजाइश हमेशा ही बनी रहती है, आवश्यकता होती है सृष्टि और प्रकृति के इन नियमों को समझने की। एचईसी के इस परिष्करण में ऊर्जा से भरे हुए डॉ. कोटनाला के साथ पूरी की पूरी एक टीम है, खासकर सादगी से लबरेज डॉ. ज्योति शाह। ज्योति शाह का जन्म सन् 1978 में लखनऊ में हुआ जो डॉ. कोटनाला की सहयोगी वैज्ञानिक हैं और उन्हीं के मार्गनिर्देशन में ज्योति शाह ने अपनी पीएचडी भी की है। जब दुनिया में सौर ऊर्जा के विषय इतने प्रचलित नहीं थे, जितने आज हैं, तब आज से लगभग चालीस वर्ष पहले डॉ. कोटनाला ने सौर ऊर्जा पर एक पुस्तक लिखी थी, जो आज तक विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ी और पढ़ाई जाती है। डॉ. कोटनाला ने सन् 1998 में एक प्रयोगशाला बनायी, जिसके निर्माण में लगभग तीन वर्ष लगे। डॉ. कोटनाला की सेवानिवृत्ति के समय यह प्रयोगशाला पर्याप्त आय का अर्जन कर रही थी और औद्योगिक जगत में विज्ञान के महत्व को रूपायित कर रही थी।
डॉ. कोटनाला नेहमारे राष्ट्र का नाम रोशन किया है और अनेक प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए नैनोसाइंस और नैनोटेक्नॉलोजी के पाठ्यक्रम निर्मित किए हैं ताकि आम भारतीय जनता तक विज्ञान के कल्याणकारी लाभ पहुंच सकें और आम जनता का जीवन प्रकाशित हो सके। नैनो प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में डॉ. कोटनाला ने पांच प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं के निर्माण में नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है, जो आज भी समाज और विज्ञान को सकारात्मक दिशा प्रदान कर रही हैं। डॉ. कोटनाला को अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। जैसे- नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र मेंएचईसी के आविष्कार हेतु लन्दन आधारित अन्तरराष्ट्रीय संस्था/कंपनी यूबीएम (यूनाइटेड बिजिनेस मीडिया) द्वारा उन्हें स्पेशल रिकग्नीशन अवार्ड दिया गया है। पूरी दुनिया का वैज्ञानिक समुदाय जानता है कि यूबीएम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अत्यन्त प्रतिष्ठित प्लेटफ़ॉर्म्स में से एक है। इसके अतिरिक्त सन् 2018 के जुलाई माह में उन्हें विश्व के विशालतम लोकतन्त्र भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा राजा रमन्ना फेलो के रूप में स्वीकार किया गया।
(लेखक प्रांजल धर प्रतिष्ठित कवि, मीडिया विश्लेषक और आधा दर्जन महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक हैं।)







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