देशभर में राष्ट्रवाद का भाव पैदा करने का श्रेय जाता है, पीएम मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को। मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कई ऐसे लम्हे आए जब भारतीयों ने महसूस किया कि एक ताकतवर देश होना क्यों जरूरी है,
देशभर में राष्ट्रवाद का भाव पैदा करने का श्रेय जाता है, पीएम मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को। मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कई ऐसे लम्हे आए जब भारतीयों ने महसूस किया कि एक ताकतवर देश होना क्यों जरूरी है, क्यों दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत को शक्तिशाली बनना होगा।
मनजीत नेगी, नई दिल्ली
2014 का लोकसभा चुनाव अगर भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चली परिवर्तन की लहर और विकास की आकांक्षा, इच्छाओं की जीत का प्रतीक था, तो 2019 का चुनाव राष्ट्रवाद को मिले जनादेश की तस्दीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोबारा मिली प्रचंड जीत के पीछे पांच साल में चलाए गए विकास कार्यों का अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना अहम कारण है, तो सांगठनिक कौशल का जिक्र करना भी लाजिमी हो जाता है। निसंदेह इस प्रचंड जनादेश का श्रेय पीएम मोदी के नेतृत्व और अमित शाह की सांगठनिक कुशलता को जाता है। लेकिन इस जीत का एक तीसरा कारण भी है, जिसने इस चुनाव में जाति-धर्म, ऊंच-नीच, अपने-पराए से गणित से आगे निकलकर एक मजबूत देश, मजबूत नेतृत्व के लिए वोट किया। यह है प्रखर राष्ट्रवाद। पहली बार भारतीय मतदाताओं ने निजी स्वार्थों को नहीं देश को तरजीह दी। वह जाति, धर्म, क्षेत्र की राजनीति से आगे उठे और मजबूत भारत, मजबूत नेतृत्व के लिए वोट किया। यही कारण है कि तमाम सियासी पंडितों के अनुमान गड़बड़ा गए।
देशभर में राष्ट्रवाद का भाव पैदा करने का श्रेय जाता है, पीएम मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को। मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में कई ऐसे लम्हे आए जब भारतीयों ने महसूस किया कि एक ताकतवर देश होना क्यों जरूरी है, क्यों दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत को शक्तिशाली बनना होगा। पिछले पांच साल में मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलताओं का तानाबाना बुनने का श्रेय अजीत डोभाल को है। वह पहले पांच साल के कार्यकाल में पीएम की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। देश के भीतर आतंकियों के नेटवर्क को ध्वस्त करना हो या अंदरूनी-बाहरी सुरक्षा को लेकर देश को अलर्ट मोड में रखना, डोभाल ने सभी को पूरे पेशेवर तरीके से अंजाम दिया। यही वजह है कि पांच साल के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर और उसे सटे सीमाई हिस्से को छोड़ दें तो कहीं भी आतंकी घटना नहीं घटी।
मोदी सरकार की जीत पर पहली प्रतिक्रिया
‘यह निजी स्वार्थों पर राष्ट्रवाद की जीत है।’ – अजीत डोभाल, एनएसए
साल 2016 में उड़ी में हुए हमले के बाद पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के लांच पैड्स पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक हो या फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना की हवाई कार्रवाई, तुरंत जवाब देने की क्षमता ने लोगों के अंदर राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करने का काम किया। लोगों ने शिद्दत से यह महसूस किया कि सबसे पहले देश आता है, उसके बाद परिवार, जाति, धर्म और दूसरी चीजें।
शायद यही वजह है कि लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की पहली प्रतिक्रिया थी कि यह निजी स्वार्थों पर राष्ट्रवाद की जीत है। डोभाल यह अच्छी तरह जानते थे कि भारत के मजबूत भारत में तब्दील होने के लिए एक मजबूत नेतृत्व और निश्चित समयावधि की आवश्यकता होगी। यह वजह थी उनके कार्यकाल में भारत ने मुहंतोड़ जवाबी कार्रवाई की रणनीति पर चलना जारी रखा। पांच साल के कालखंड में हुई तमाम घटनाओं और उसके बाद सरकार की प्रतिक्रिया ने खुद-ब-खुद लोगों के मन में राष्ट्रवाद की भावना को पुख्ता किया।
प्रधानमंत्री मोदी अजीत डोभाल का महत्व समझते हैं, शायद यही वजह है कि उन्हें फिर से पांच साल का कार्यकाल दिया गया है। यही नहीं उन्हें कैबिनेट रैंक पर प्रोन्नत किया गया है। पिछली बार उनका कद राज्यमंत्री के बराबर था। पीएम मोदी के सबसे विश्वस्त माने जाने वाले एनएसए अजीत डोभाल देश के सबसे शक्तिशाली नौकरशाह हैं। उन्हें पीएम मोदी की नाक, कान और आंख कहा जाता है। यानी उन्हें पता होता है कि पीएम क्या चाहते हैं।
उन्हें कुछ समय पहले स्ट्रैटिजिक पॉलिसी ग्रुप का प्रमुख बनाया गया। इस ग्रुप में कैबिनेट सचिव, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, तीनों सेनाओं के प्रमुख, आरबीआई के गवर्नर, विदेश सचिव, गृह सचिव, वित्त सचिव, रक्षा सचिव, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग के सचिव तथा खुफिया ब्यूरो के प्रमुख भी आते हैं।
1999 में इसका गठन बाहरी, आंतरिक और आर्थिक सुरक्षा के मामलों में नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की मदद के लिए किया गया था। 1999 में एसपीजीके गठन के लिए जारी नोटिफिकेशन में कहा गया था कि कैबिनेट सेक्रेटरी इसके चेयरपर्सन होंगे। मोदी सरकार ने 11 सितंबर को नोटिफिकेशन और 8 अक्टूबर को गजट प्रकाशित किया है, जिसके मुताबिक एनएसएको इस समूह का चेयरमैन घोषित कर दिया गया। इसमें पहले 16 सदस्य होते थे और अब 18 होंगे। इसमें कैबिनेट सेक्रटरी और नीति आयोग के वाइस चैयरमैन को दो नए सदस्यों के रूप में शामिल किया गया है। एसपीजीके पुनर्गठन ने एनएसएको राष्ट्रीय सुरक्षा के रणनीतिक ढांचे में सबसे ऊपर ला दिया।
दरअसल, डोभाल के एनएसए के पद पर रहते हुए कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने मजबूत भारत की अवधारणा को आगे बढ़ाया। फिर वह साल 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक हो या साल 2017 में 70 दिन तक चला डोकलाम गतिरोध। इसके शांतिपूर्ण हल में अजीत डोभाल की खास भूमिका रही। उनकी सलाह पर पूरे गतिरोध के दौरान भारत अपने रुख पर अड़ा रहा। भारत के बदले तेवर देखते हुए चीन को समाधान के लिए बाध्य होना पड़ा। डोभाल के बारे में कहा जाता है कि वह जैसे के साथ तैसा की रणनीति पर चलने वाले एनएसए हैं। इसका उदाहरण उनकी डोकलाम गतिरोध के दौरान चीन यात्रा से मिलता है। जब अजीत डोभाल बीजिंग में चीन के स्टेट काउंसिलर यांग जिएची से मिले थे तो उनसे पूछा गया था, ‘क्या ये आपका इलाका है?’इस पर डोभाल ने कहाथा, ‘क्या हर विवादित इलाका अपने आप चीन का हो जाता है?’ चीन को उनके जवाब के बाद भारत के रुख का अंदाजा हो गया था। इसके अलावा डोभाल के एनएसए रहते भारत ने इस्राइल, यूएई और फ्रांस के साथ करीबी सामरिक रिश्ते विकसित किए हैं। पठानकोट एयरबेस अटैक को न्यूट्रलाइज करना हो या फिर अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को गिरफ्तार करना । देश के अहम फैसलों में उनकी राय की अहमियत और खास जगहों पर उनकी मौजूदगी से यह जाहिर होता है । रक्षा, आंतरिक मामले और विदेश से जुड़े अहम मुद्दे डोभाल के जिम्मे हैं।
अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदेबाजी मामले के बिचौलिये को अगर भारत लाया जा सका तो इसके पीछे अजीत डोभाल और उनकी टीम की मेहनत थी। दरअसल, डोभाल और उनकी टीम लंबे समय से यूएई सरकार से संपर्क में थी। अजीत डोभाल ने मिशेल के प्रत्यर्पण के लिए एक क्रैक टीम बनाई थी। इस टीम में सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कुल चार सदस्य शामिल थे, इस टीम में सीबीआई के अलावा रॉ के भी अधिकारी शामिल थे।
पुलवामा हमले के एक पखवाड़े के भीतर पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों का सफाया करने की वायुसेना की रणनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में तैयार किया गया था। वायुसेना, नौसेना के शीर्ष अधिकारियों से रणनीति पर चर्चा से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पल-पल की जानकारी देने तक में उनकी अहम भूमिका रही।
पुलवामा हमले के बाद सरकार की ओर से सेनाओं को बदला लेने की पूरी छूट देने के साथ ही अजीत डोभाल मिशन में जुट गए थे। उन्होंने खुफिया विभाग और सेना के बीच समन्वय कर योजना की रूप रेखा तय की। उरी हमले के बाद 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक के मुकाबले इस बार चुनौती और कड़ी थी क्योंकि पाकिस्तान ने पुलवामा हमले के तुरंत बाद अपनी सेना को अलर्ट कर दिया था। सीमा पर मौजूद लांचिंग पैड से आतंकियों को सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया था। इलाके में बर्फबारी भी कमांडों कार्रवाई के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही थी।तमाम चुनौतियों पर विचार करने के बाद हवाई हमले की योजना बनाई गई और लक्ष्य आतंकी संगठनों के गढ़ और ट्रेनिंग कैंप बालाकोट को बनाया गया।
डोभाल किस तरह से कूटनीति की अहम कड़ी बन गए हैं, देश के अहम फैसलों में उनकी राय की अहमियत और खास जगहों पर उनकी मौजूदगी से यह जाहिर होता है। पांच साल के उनके कार्यकाल के दौरान हुई घटनाओं ने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को बनाए रखने का काम किया और भाजपा की सत्ता में वापसी सुनिश्चित हो सकी।







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