फूलों की दुनिया में अपनी खूबसूरती, अनूठेपन और खुशबू की वजह से ऑर्किड की अलग ही पहचान

फूलों की दुनिया में अपनी खूबसूरती, अनूठेपन और खुशबू की वजह से ऑर्किड की अलग ही पहचान

इन दिनों यहां ऑर्किड के दिलकश फूल खिल रहे हैं। इनमें से एक खास ऑर्किड फूल है द्रौपदी माला। माना जाता है कि द्रौपदी जी इस फूल को माला व गजरे के रूप में इस फूल को पहनती थी। ये आसाम व अरुणाचल प्रदेश का राज्य पुष्प भी है और बीहू उत्सव के समय नृत्यांगनाएं ऑर्किड की द्रौपदी माला को पहनती हैं।

मैंने उत्तरकाशी शहर के बीचों बीच मां गंगा के तट पर केदारमार्ग अपने निवास में स्थित अपनी छोटी सी बगिया में द्रौपदी माला नामक फूलों की सुंदर दुनियां बसायी है। पिछले दस वर्षों से लगातार यह द्रौपदी माला का पुष्प मेरे आंगन में खिलखिला रहा है।

इन दिनों यहां ऑर्किड के दिलकश फूल खिल रहे हैं। इनमें से एक खास ऑर्किड फूल है द्रौपदी माला। माना जाता है कि द्रौपदी जी इस फूल को माला व गजरे के रूप में इस फूल को पहनती थी। ये आसाम व अरुणाचल प्रदेश का राज्य पुष्प भी है और बीहू उत्सव के समय नृत्यांगनाएं ऑर्किड की द्रौपदी माला को पहनती हैं।

इधर सरकारी स्तर पर वन विभाग ने भी हल्द्वानी में फूलों की खेती को प्रोत्साहन देने और ऑर्किड की कई किस्मों को सहेजने के उद्देश्य से ऑर्किड उद्यान बनाकर इस पर लाखों रुपये खर्च कर रहा है। अंतर्राष्ट्रायी बाजार में कट फ्लावर श्रेणी में ऑर्किड की अच्छी मांग होती है। हिमालयी राज्यों का पर्यावरण तो इसके अनुकूल है ही, इसके अलावा दक्षिण भारत के राज्य केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र भी इसका व्यवसायिक उत्पादन करते हैं। थोड़ा सा प्रयास किया जाय तो धार्मिक, औषधीय व सांस्कृतिक विरासत लिए द्रौपदी माला की सुगंध से देवभूमि भी महक सकती है। द्रोपदी के गजरे पर सजने वाला इस पुष्प को द्रौपदी माला कहते हैं।

मां सीता काे भी ये पुष्प काफी प्रिय थे। इसलिए इसका एक नाम सीतावेणी भी है। द्रोपदी माला नामक यह फूल असम व अरुणाचल प्रदेश का राज्य पुष्प है। मेडिकल गुणों की वजह से इसकी खासी डिमांड है। आंध्र प्रदेश में इसकी तस्करी भी होती है। महाभारत की अहम पात्र द्रोपदी जी माला के तौर पर इन फूलों का इस्तेमाल करती थीं। जिस वजह से इसे द्रोपदी माला कहा जाता है। वनवास के दौरान सीता मां से भी इसके जुड़ाव का वर्णन है। यहीं वजह है कि महाराष्ट्र में इसे सीतावेणी नाम से पुकारा जाता है।

अरुणाचल प्रदेश और असम का राज्य पुष्प फाक्सटेल आर्किड इन दिनों उत्तरकाशी के मांगली बरसाली गांव, नाकुरी में भी महक रहा है। उत्तरकाशी शहर के बीचों बीच मैंने इस फूल की पौध को परीक्षण के तौर पर अपने गांव के अखरोट के पेड़ से इसे निकालकर लाया। इसको अपने आवास उत्तरकाशी में लगे बांझ के पेड़ से मिट्टी का लेप लगाकर बांध दिया। कुछ पौध को टोकरी में भी लगाया। लेकिन 8 महीने तक इसकी देखभाल करने के बाद इस मई माह में बांझ के पेड़ से लटके इस द्रौपदी माला पर सुंदर फूल खिल आये। जबकि टोकरी व गमले में लगे पौध पर फूल नहीं खिले।

इससे यही लगता है कि द्रौपदी माला में फूल खिलने के लिए इसको लटकन की आवश्यकता होती होगी।। इस पुष्प को धार्मिक, औषधीय और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी माना जाता है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 12 किमी दूर मांगली गांव में एक अखरोट के पेड़ पर यह पुष्प पिछले 20 वर्षों से खिलता आ रहा है, जो बेहद ही खूबसूरत है और आने-जाने वाले ग्रामीणों व अतिथियों को आकर्षित कर रहा है। अभी हाल में ये फूल नाकुरी गांव में एक पुराने चुलु के पेड़ पर नही बहुतायत में खिल रहा है।

द्रौपदी माला का फूल इतना सुंदर और आकर्षक होता है कि इसे असम और अरुणाचल प्रदेश ने इसे अपना राज्यपुष्प घोषित कर रखा है। इधर उत्तराखंड में स्थानीय स्तर पर इसके बारे में स्थानीय ग्रामीणों को भी कोई जानकारी नहीं है। जबकि, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया व भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम व बंगाल में ये बहुतायत में प्राकृतिक रूप से उगता है।

फाक्सटेल आर्किड अधिपादप श्रेणी का पौधा है। ये अखरोट, बांज, तुन, चुलु और अन्य पेड़ों के तने, शाखाएं, दरारों, कोटरों, छाल आदि में मौजूद मिट्टी में उपज जाते हैं। उत्तरकाशी के अपने गांव मांगलीसेरा में एक अखरोट के पेड़ में मैं इस फूल को पिछले 10 वर्षों से देख रहा हूं गांव में इस पौधे का बीज हवा से ही पहुंचा होगा। साथ ही अखरोट के पेड़ पर इस पौधे के पनपने के लिए अनुकूल स्थिति व वातावरण मिला होगा।फाक्सटेल आर्किड के पौधे आसानी से पनपते नहीं हैं। इनके लिए अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है।

गौरतलब है कि जानकारों के मुताबिक अस्थमा, किडनी स्टोन, गठिया रोड व घाव भरने में द्रोपदी माला को दवा के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। पंश्चिम बंगाल व आसाम में इसे कुप्पु फूल के नाम से जाना जाता है। बीहू नृत्य में महिलाओं द्वारा इस फूल का श्रृंगार किया जाता है। असम का बीहू नृत्य दुनियाभर में प्रसिद्ध है। सांस्कृतिक कार्यक्रम से लेकर शुभ अवसर में महिलाओं द्वारा बीहू नृत्य किया जाता है।

मान्यताओं के मुताबिक इस दौरान महिलाएं बालों में इस फूल को जरूर लगाती है। वहां इसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आपको बताते चलें कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम पंचवटी नासिक में रूके थे। तब सीता मां ने भी इस फूल का इस्तेमाल किया था। जिस वजह से इसे सीतावेणी भी कहा जाता है।

बांज व अन्य पेड़ों से जुड़ाव द्रोपदी माला आर्किड प्रजाति का हिस्सा है। आर्किड जमीन व पेड़ दोनों पर होता है। आमतौर पर 1500 मीटर ऊंचाई पर मिलने वाला द्रोपदी माला बांज, अखरोट व अन्य पेड़ों पर नजर आ जाता है। धार्मिक व औषधीय महत्व से अंनजान होने पर लोग संरक्षण के प्रति जुड़ाव नहीं रख पाते। चारे के चक्कर में नुकसान पहुंचा देते हैं। उत्तराखंड में उत्तरकाशी के मांगलीसेरा गांव में, नैनीताल व गौरीगंगा इलाके में देखा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम फॉक्सटेल है।

आपको बताते चलें कि ये फूल मात्र उन्ही पेड़ों पर अपना आश्रय बनाते हैं जो पेड़ सूखने, सड़ने की कगार पर पहुंच जाते हैं। मैंने द्रौपदी माला की पौध को किसी स्वस्थ पेड़ की छाल पर नहीं देखा।

लोकेंद्र सिंह बिष्ट, प्रांत संयोजक, जीवीएम

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