* ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त (पहाड़ी) डंगवाल
21 जून 2025 को जब पूरी दुनिया 11वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है, तब यह दिन हम उत्तराखंड के पूर्व सशस्त्र सैनिकों और अर्धसैनिक बलों के समुदाय के लिए एक गंभीर आत्मचिंतन और प्रेरणा का अवसर लेकर आया है। यह केवल एक प्रतीकात्मक दिवस नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक विरासत का पुनः स्मरण है जिसे हमने अपने जीवन की व्यस्तता में कहीं खो दिया था। और आज, जब हम सेवा निवृत्ति के बाद एक नया अध्याय शुरू कर चुके हैं, तो योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि आदर्श जीवन जीने की कला बनकर हमारे सामने खड़ा है।
योग: केवल शरीर नहीं, सम्पूर्ण जीवन का सम्यक संतुलन
पूर्व सैनिक समुदाय एक अनुशासित, साहसी, निःस्वार्थ और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत वर्ग रहा है। लेकिन सेवा काल की कठोरता और सेवानिवृत्त जीवन की अचानक मिली निस्तब्धता के बीच शरीर थकता है, मन अवसादग्रस्त होता है और आत्मा दिशाहीन। ऐसे में योग वह जीवनदृष्टि है जो हमें पुनः ऊर्जा, उद्देश्य और स्थिरता प्रदान करती है।
योग का अर्थ ही है “जोड़ना” — शरीर से मन, मन से आत्मा और आत्मा से परम चेतना तक। जब हम योग को अपनाते हैं, तो हमारे भीतर एक चार-स्तरीय संतुलन स्थापित होता है —
• शारीरिक स्वास्थ्य
• मानसिक स्थिरता
• बौद्धिक जागरूकता
• आत्मिक शांति
और यह चारों ही वो स्तंभ हैं, जिन पर एक आदर्श सेवानिवृत्त जीवन की नींव रखी जा सकती है।
सेहत: सेवा से संन्यास तक का सेतु
सेवा में रहते हुए हमारी दिनचर्या अनुशासित और सक्रिय रहती है। लेकिन जैसे ही हम सेवानिवृत्त होते हैं, वह अनुशासन ढीला पड़ने लगता है और शरीर शिथिल। यही वह समय है जब रोग-प्रतिकारक क्षमता कम होने लगती है, और शरीर अनेक बीमारियों का घर बन जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों का दर्द, अनिद्रा, तनाव — ये सब सेवानिवृत्त जीवन के अनचाहे उपहार हैं।
योग और प्राणायाम इन समस्याओं का सबसे सरल, सुरक्षित और प्रभावी समाधान हैं। “पहला सुख निरोगी काया” केवल कहावत नहीं, एक जीवन मंत्र है। स्वस्थ शरीर ही मन और आत्मा को ऊर्जावान बना सकता है। जब शरीर स्फूर्त रहता है तो हम अपने परिवार, समाज और स्वयं के लिए एक सकारात्मक शक्ति केंद्र बन सकते हैं।
मन की लड़ाई: तनाव, अकेलापन और मानसिक अवसाद के विरुद्ध
सेना और अर्धसैनिक बलों में सेवा करते समय मन को कठोर और नियंत्रण में रखना पड़ता है। किन्तु सेवानिवृत्त होते ही जब वह कठोर अनुशासन हटता है, तो मन की चंचलता, असुरक्षा और अवसाद तीव्रता से उभरने लगती है। अकेलापन, महत्वहीनता की भावना और लक्ष्यहीनता हमारे शौर्यपूर्ण जीवन के अनुभवों को कहीं दबा देती है।
ध्यान और आत्मनिरीक्षण (Meditation and Self-awareness) हमें इस आंतरिक तूफान से निकालने का मार्ग दिखाते हैं। जैसे सेना में लड़ाई जीतने से पहले रणनीति बनानी होती थी, वैसे ही जीवन की इस दूसरी पारी को सफल बनाने के लिए भीतर की लड़ाई जीतनी होगी — योग इस रणनीति का सबसे विश्वसनीय हथियार है।
बौद्धिक ऊर्जा: अनुभव से समाज निर्माण तक
हमारे पास अनुभव का विशाल भंडार है — युद्ध, नेतृत्व, अनुशासन, संगठन, समर्पण, सामूहिकता। क्या हमने कभी सोचा है कि इस अनुभव का हम समाज निर्माण में कैसे उपयोग कर सकते हैं?
एक स्वस्थ और जागरूक मन जब समाज की समस्याओं को देखता है, तो समाधान की प्रेरणा स्वतः प्रस्फुटित होती है। योग के माध्यम से हम अपनी बौद्धिक ऊर्जा को न केवल सृजनात्मक दिशा में प्रवाहित कर सकते हैं, बल्कि समाज को मानवीयता, सद्भाव और राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर अग्रसर कर सकते हैं।
आत्मिक चेतना: सेवा का दूसरा चरण
कई पूर्व सैनिक यह मानते हैं कि उनका सेवा काल समाप्त हो चुका है, लेकिन यह सोच अधूरी है। रिटायरमेंट केवल वर्दी से होता है, कर्तव्य से नहीं। अब हमारे पास समय है — सेवा का दूसरा चरण आरंभ करने का। और यही आत्मिक चेतना का केंद्र है — अपने अंदर की सेवा भावना को पहचानना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना।
यह सेवा स्वस्थ जीवन जीकर, युवा पीढ़ी को प्रेरित कर, जागरूकता अभियान चलाकर, स्वदेशी को बढ़ावा देकर, और संस्कृति-संरक्षण में योगदान देकर पूरी की जा सकती है।
पूर्व सैनिक समुदाय की भूमिका: एक संगठित जागरूक शक्ति उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां से हजारों की संख्या में सैनिक निकलते हैं, वहाँ पूर्व सैनिक समुदाय एक विचारशील और
निर्णायक शक्ति बन सकता है। अगर हर गाँव, हर कस्बे में पूर्व सैनिकों का एक योग समूह, स्वास्थ्य जागरूकता मंच और सामूहिक सेवा समूह खड़ा हो जाए, तो राज्य की दिशा बदल सकती है।
हम योग के माध्यम से सामूहिक चेतना को पुनर्जीवित करें — एक साथ उठें, एक साथ सोचें, एक साथ सेवा करें। यही पूर्व सैनिक समुदाय का आदर्श नेतृत्व होगा — जिसमें व्यक्तिगत उत्थान के साथ सामूहिक कल्याण निहित है।
उपसंहार: योग से बनेगा सार्थक जीवन
2025 का यह योग दिवस हमारे लिए एक नए अध्याय का आरंभ है। यह हमें कहता है कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर की असंतुलन से है — और योग उसका शस्त्र है।
हमें अब इस सोच को आत्मसात करना होगा कि—
• स्वस्थ रहना कर्तव्य है।
• योग पुनरुत्थान का माध्यम है।
• समाज के लिए जीना सेवा की दूसरी परिभाषा है।
• और सामूहिक चेतना से ही राष्ट्र निर्माण होता है।
इस लेख के माध्यम से मैं अपने समस्त पूर्व सशस्त्र और अर्धसैनिक बल समुदाय के साथियों से यह निवेदन करता हूँ कि योग को केवल शरीर तक सीमित न रखें, इसे अपने जीवन दर्शन का हिस्सा बनाएं।
प्रत्येक सुबह का सूरज हमें नया अवसर दे रहा है — एक श्रेष्ठ जीवन जीने का, और समाज को कुछ लौटाने का।
आइए, हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम अपने जीवन के हर दिन को योगमय बनाएंगे — न केवल अपने लिए, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बनेंगे। पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे” का अर्थ है कि दूसरों को उपदेश देना बहुत आसान है, लेकिन उन उपदेशों पर खुद अमल करना बहुत मुश्किल है ।
जय हिन्द।


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