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धराली-हर्षिल आपदा के बाद ग्राउंड ज़ीरो पर सबसे पहले पहुंचे ‘आजतक’ के मनजीत नेगी

'आपदा से बचने के लिए जब लोग भाग रहे थे, वह उस दिशा में बढ़ रहे थे, जहां मौत ने दस्तक दी थी।' यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की सच्चाई है, जिसने उत्तराखंड की दो सबसे बड़ी आपदाओं 17 जून 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 5 अगस्त 2025 की धराली, हर्षिल आपदा की जमीनी हकीकत सबसे पहले दुनिया के सामने रखी।

उत्तरकाशी में भीषण प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर पहाड़ों में रहने वाले लोगों की नाजुक स्थिति और राहत-बचाव कार्यों की चुनौतियों को सामने ला दिया। बादल फटने और बाढ़ ने धराली, हर्षिल और सुखी टॉप जैसे इलाकों में भारी तबाही मचाई। इस मुश्किल घड़ी में, हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ के कार्यकारी रक्षा संपादक मनजीत नेगी सबसे पहले वहां कवरेज के लिए पहुंचे और जान जोखिम में डालकर आपदा की असली तस्वीर देश के सामने रखी।

हिल मेल से खास बातचीत में मनजीत नेगी ने बताया, ‘गंगोत्री मार्ग स्थित धराली और चीन सीमा पर स्थित पर्यटन स्थल हर्षिल में प्रकृति ने कहर बरपाया। सबसे पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंचा तो वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई आपदा की यादें ताज़ा हो गईं। उस समय भी, मैं गुप्तकाशी से 50 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करके सबसे पहले केदारनाथ धाम पहुंचा था। ‘जब मैंने पहली बार मलबे में दबे लोगों की चीखें सुनीं, तो माइक और कैमरा थामे मेरे हाथ कांप रहे थे। लेकिन, भीतर से एक ताकत आई, शायद बाबा केदार की, जिसने कहा कि पीछे मत हटो।’ तब मैंने बाबा केदार के आशीर्वाद से केदारनाथ त्रासदी की पूरी कहानी दुनिया के सामने रखी।

हेलीकॉप्टर भी जहां नहीं उतरे, वहां जोखिम भरे रास्तों से पैदल पहुंचे

समय बदला, घटनाएं बदलीं, लेकिन सेवा का जज्बा नहीं बदला। 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले की धराली और हर्षिल घाटी में एक बार फिर बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदा ने कहर बरपाया। कई गांवों का संपर्क कट गया, आने जाने वाली सड़कें टूट गई और प्रशासनिक मदद पहुंचने से पहले ही एक आवाज फिर उसी दिशा में निकल पड़ी। मनजीत नेगी आपदा के बाद एक बार फिर सबसे पहले धराली और हर्षिल घाटी पहुंचे। वह ऐसे पहले पत्रकार हैं जो हादसे के बाद ग्राउंड जीरो पर सबसे पहले पहुंचे। उन्होंने वहां की दर्दनाक तस्वीरें देश के सामने रखीं। हेलीकॉप्टर भी जहां नहीं उतरे, वहां उन्होंने पैदल, ट्रेकिंग और कभी-कभी जोखिम भरे रास्तों से पहुंचकर स्थानीय हालात कैमरे में कैद किए और कैमरे के माध्यम से पूरे देश को वहां की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया।

मनजीत नेगी ने बताया कि इस बार वैसी ही स्थिति धराली और हर्षिल में थी। बताते हैं, ‘5 अगस्त की शाम 5 बजे सड़क के रास्ते पूरी रात का सफर तय करके उत्तरकाशी पहुंचा। 6 अगस्त को काफी मुश्किलों के साथ मैं हर्षिल पहुंच पाया। लगभग आधी रात और सुबह 5 बजे से 14 राजपूताना रेजिमेंट के जवानों के साथ सबसे पहले हर्षिल में आर्मी कैंप के ऊपर आई उस तबाही को कवर किया, जिसमें सेना के 8 जवान और एक जेसीओ आपदा का शिकार हुए। उसके बाद, धराली में खीर गाड़ से आई प्रलय को देखा। इस विनाशकारी घटना में धराली में करीब 150 से अधिक होटल, रिजॉर्ट और लोगों के मकान 40 फीट से अधिक के मलबे में दब गए। इस भीषण आपदा के समय, पिछले कई दिनों से सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवान दिन रात राहत और बचाव कार्य में जुटे हैं। अब आने वाले समय में इस आपदा का विश्लेषण होगा।’

उनकी रिपोर्टिंग में साफ दिखा कि कैसे हर्षिल में गंगोत्री को जोड़ने वाला हाईवे मलबे में तब्दील हो चुका था। जगह-जगह गाड़ियां उलटी पड़ी थीं, दुकानें और घर बह गए थे, आर्मी के मेस हॉल की 12 फीट ऊंची इमारत आधी से ज्यादा जमीन में धंस चुकी थी और किचन का सामान कीचड़ में बिखरा पड़ा था। उनका यह साहस और समर्पण सिर्फ एक पत्रकारिता का उदाहरण नहीं, बल्कि सच्ची ग्राउंड रिपोर्टिंग की मिसाल है, जहां खबर तक पहुंचने के लिए रिपोर्टर अपनी जान की परवाह किए बिना आगे बढ़ता है, ताकि सच्चाई लोगों तक पहुंचे।

मेरे लिए यह सिर्फ काम नहीं, सेवा है

उनका मानना है कि आपदा में रिपोर्टिंग करना सिर्फ कैमरा उठाना नहीं होता, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टि चाहिए। आपदाओं की सच्चाई को बिना सनसनी फैलाए, जिम्मेदारी से दिखाना भी एक सेवा है। 2013 में केदारनाथ और 2025 में धराली, इन दोनों त्रासदियों में उनकी भूमिका किसी गुमनाम नायक से कम नहीं। जब भी हिमालय चीखा, उन्होंने उसकी पहली चीख सुनी… और दुनिया तक पहुंचाई।

Written by
Hill Mail

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