सिस्टम की लापरवाही से बुझ गए सुक्खी गांव के दो चिराग

सिस्टम की लापरवाही से बुझ गए सुक्खी गांव के दो चिराग

उत्तरकाशी ज़िले के धराली क्षेत्र में हाल ही में हुई प्राकृतिक आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तेज़ी से चल रहे थे, लेकिन इसी बीच लापरवाही और अव्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया।

डबरानी के पास हुआ दर्दनाक हादसा

उत्तरकाशी में आई जलप्रलय के बाद 18 अगस्त से धराली के डबरानी क्षेत्र में बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) द्वारा मार्ग खोलने का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा था। यह इलाका लगातार हो रहे भूस्खलन और बारिश से पहले ही संवेदनशील बना हुआ था। उसी समय पास के सुक्खी गांव के दो युवक 25 वर्षीय मनीष राणा और 26 वर्षीय अरुण अपने गांव से बाहर किसी आवश्यक कार्य के लिए निकल रहे थे।

ग्रामीणों के अनुसार, बीआरओ की ओर से अस्थायी रूप से रास्ता पार करने की अनुमति दी गई थी, हालांकि यह इलाका अत्यंत असुरक्षित था। जब ये दोनों युवक डबरानी के पास भूस्खलन क्षेत्र को पार कर रहे थे, तभी अचानक ऊपर से भारी मात्रा में मलबा गिर गया।

बीआरओ की पोकलैंड मशीन की असावधानी ने स्थिति को और भयावह बना दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मलबा गिरने के दौरान दोनों युवक फंस गए, और पोकलैंड ऑपरेटर ने हड़बड़ी में मशीन को पीछे खींचा, जिससे दोनों युवक उसी के नीचे आ गए और मौके पर ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई।

गांव में शोक और गुस्सा

सुक्खी गांव में यह खबर आग की तरह फैली। पूरा गांव मातम में डूब गया। मनीष और अरुण दोनों ही अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले थे। उनके असामयिक निधन ने कई घरों को बेसहारा कर दिया। इस हादसे के बाद ग्रामीणों में भीषण आक्रोश है।

गांववालों का आरोप है कि बीआरओ और प्रशासन ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम किए बिना आम लोगों को मलबा क्षेत्र पार करने दिया, जो कि सीधी लापरवाही और प्रशासनिक विफलता है।

प्रशासन पर सवाल, कार्रवाई की मांग

घटना के बाद पुलिस और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर तैनात कर दी गई हैं, लेकिन लोगों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। ग्रामीण बीआरओ की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और ज़िम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि ‘जब इतना बड़ा खतरा था, तो लोगों को रास्ता पार करने क्यों दिया गया? मनीष और अरुण की जान बच सकती थी अगर सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई होती।’

क्या कहती है प्रशासनिक व्यवस्था?

फिलहाल, प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है। हालांकि घटना की जांच की बात कही गई है, लेकिन लोगों का भरोसा तब तक बहाल नहीं होगा जब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती।

धराली में मनीष और अरुण की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही की एक बड़ी कीमत है। यह घटना बताती है कि आपदा प्रबंधन सिर्फ मशीनें और मजदूर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता, समय पर निर्णय और सुरक्षा प्राथमिकताओं का विषय है।

जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, धराली के पहाड़ों में सिर्फ भूस्खलन नहीं, भरोसे का भी ढहना जारी रहेगा।

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