उत्कृष्ट अग्निवीर प्रशिक्षण मेरी प्राथमिकता

उत्कृष्ट अग्निवीर प्रशिक्षण मेरी प्राथमिकता

गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर, लैंसडाउन के कमान्डेंट विशिष्ट सेवा मेडल ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी का विशेष साक्षात्कार

वीर भूमि उत्तराखंड में जन्म लेने वाले वीर योद्धाओं ने अपने अद्वितीय साहस, अनुशासन और निष्ठा से एक अलग ही मुकाम हासिल किया है। इस समय गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर की कमान ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी संभाल रहे हैं। कुशल सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर नेगी नेतृत्व क्षमता, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से युक्त प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के धनी हैं। उन्होंने देश के विभिन्न संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सेवाएं दी हैं। हिल-मेल के संपादक वाईएस बिष्ट ने ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी से विशेष बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस संवाद के प्रमुख अंश:

गढ़वाल राइफल्स के कमांडेंट पद की जिम्मेदारी को आप कैसे देखते हैं? कृपया अपने कार्यकाल के अनुभवों के बारे में भी बताएं?

मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे गढ़वाल राइफल्स जैसे गौरवशाली रेजिमेंट की कमान संभालने का अवसर प्राप्त हुआ। 10 जून 1995 को भारतीय सेना के गढ़वाल राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया। पिताजी भी भूतपूर्व सैनिक हैं, जिन्होंने गढ़वाल रेजिमेंट में अपनी सेवाएं दीं। सेंटर कमान्डेंट के रूप में नियुक्ति अत्यंत सम्मान की बात है। इस सम्मानजनक जिम्मेदारी को रेजिमेंट के लिए अपना योगदान देने का अभूतपूर्व अवसर मानता हूं और रेजिमेंट का तहे दिल से आभारी हूं कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा। अब तक का मेरा अनुभव अत्यंत संतोषजनक रहा है। हम अपने निर्धारित लक्ष्यों की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर हैं और सभी गढ़वीरों से सकारात्मक सहयोग प्राप्त हो रहा है।

मैंने अपने कार्यकाल के एक वर्ष में पूरे मनोयोग से प्रयास किया है जो कि मुख्यत: इन प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहे है:-
(क) उत्कृष्ट दर्जे का अग्निवीर प्रशिक्षण।
(ख) आर्मी कोर्स में सर्वोच्च ग्रेडिंग प्राप्त करना।
(ग) जवानों के समय से और सही डाक्यूमेंटेशन व वेतन-भत्तों का भुगतान।
(घ) वीर नारियों, वीर माताओं, गौरव सेनानियों एवं उनके आश्रितों को हरसंभव सहायता।
(ङ) लैंसडाउन कैंट एवं कोटद्वार कैंप का समग्र विकास।
(च) सभी सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए योजनाएं एवं सुविधाएं मुहैया कराना।
(छ) रेजिमेंटल परिवार में खुशी और समृद्धि का माहौल बनाए रखना।
(ज) गढ़वाल राइफल्स की सभी बटालियनों को उनके कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान करना।
(झ) गढ़वाल राइफल्स के उत्तम आदर्शों, गौरवपूर्व इतिहास, रीति-रिवाजों एवं परंपराओं को और अधिक प्रतिष्ठित बनाना।

‘अग्निपथ योजना’ के तहत अग्निवीर सैनिकों की भर्ती के बाद उनकी प्रशिक्षण प्रक्रिया कैसी रही है?

अग्निपथ योजना को पूरे गढ़वाल क्षेत्र में बहुत समर्थन मिला है। गढ़वाल के युवाओं ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया है, जो यह दर्शाता है कि देश सेवा के प्रति उनका समर्पण अडिग है। यह बताते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है कि अग्नि वीरों का प्रशिक्षण अव्वल दर्जे का चल रहा है। अग्निवीरों का प्रशिक्षण अत्यंत उच्च गुणवत्ता का रखा गया है, जिसमें अनुशासन, मेहनत, और दक्षता का विशेष ध्यान दिया गया है। रक्षा मंत्रालय ने भी अग्निवीरों के प्रशिक्षण को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए आवश्यक संसाधनों और वित्तीय सहायता स्वीकृत किए हैं।

अग्निपथ योजना के तहत सेना में शामिल हो रहे युवाओं के लिए आप किन चुनौतियों को देखते हैं? साथ ही, इन्हें कैसे सुलझाया जा सकता है?

मैं यह कहना चाहूंगा कि गढ़वाल की युवा पीढ़ी अत्यंत मेहनती, उत्साहपूर्ण एवं कर्मठ है। उनके लिए कोई भी चुनौती दुर्गम नहीं है और वे हर बाधा का सामना उत्कृष्ट दक्षता से करते हैं। गढ़वाल के युवा देश की सेना और मातृभूमि गढ़वाल के प्रति पूर्णत: समर्पित हैं।

सैन्य सेवा का सफर
• 08 जुलाई 1974 को उत्तराखंड के लैंसडाउन शहर में सैन्य परिवार में हुआ था ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी का जन्म
• 17 वर्ष की उम्र में यूपीएससी एनडीए खड़कवासला, पुणे से परीक्षा उत्तीर्ण की, जुलाई 1991 में एनडीए में शामिल हुए
• 10 जून 1995 को आईएमए देहरादून से पास आउट होकर गढ़वाल राइफल्स में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन लिया
• 30 वर्षों के गौरवशाली सैन्य जीवन के दौरान ‘गढ़वाल राइफल्स’ में विभिन्न महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में भाग लिया

 

अपने जीवन के बारे में बताएं- आपकी जन्मभूमि, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और जीवन में आए संघर्ष के बारे में बताइए?

मेरा जन्म उत्तराखंड के लैंसडाउन शहर में 08 जुलाई 1974 को एक सैन्य परिवार में हुआ था। मेरी प्रारंभिक शिक्षा लैंसडाउन से शुरू हुई। मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ग्राम पटोटीया, नैनी नैनीडांडा ब्लॉक, तहसील पौड़ी, जिला पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड) से है। 17 वर्ष की उम्र में मैंने यूपीएससी एनडीए (राष्ट्रीय रक्षा अकादमी) खड़कवासला, पुणे की परीक्षा उत्तीर्ण की और जुलाई 1991 में एनडीए में शामिल हुआ। 10 जून 1995 को आईएमए (भारतीय रक्षा अकादमी), देहरादून से पास आउट होकर गढ़वाल राइफल्स में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन लिया। अपने 30 वर्षों के गौरवशाली सैन्य जीवन के दौरान मैंने ‘गढ़वाल राइफल्स’ में विभिन्न महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में भाग लिया।

‘हिल-मेल’ पत्रिका का उद्देश्य ‘एक अभियान, पहाड़ों की ओर लौटने का’ है। इस अभियान के संदर्भ में आप उत्तराखंड के लिए क्या कर रहे हैं और भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?

हम पलायन की समस्या को रोकने के लिए जगह-जगह जन-जागरूकता अभियान चला रहे हैं। हमारा उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर पैदा करना है। पूर्व सैनिकों के लिए नई सीएसडी कैंटीन खोलने से लेकर, ईसीएचएस की मदद से गांव-गांव जाकर स्वास्थ्य शिविर स्थापित कर जरूरतमंदों को सुविधा उपलब्ध कराई जा रही हैं। रिकार्ड्स की मदद से सतत मिलाप योजना के तहत घर-घर जाकर सभी सैनिकों की समस्याओं को सुनते हैं और उनका समाधान कर रहे हैं। भविष्य में लोगों को अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर अच्छी शिक्षा और रोजगार के लिए पर्वतीय कृषि को बढ़ावा देना, लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना और कौशल विकास की योजनाओं पर जोर दिया जाएगा।

आज की युवा पीढ़ी के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे, विशेष रूप से उन युवाओं के लिए जो सेना में जाने की तैयारी कर रहे हैं या अपने राज्य की सेवा करना चाहते हैं ?

सेना में शामिल होना गौरव की बात है, परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है अनुशासन। मैं युवा पीढ़ी से यही कहना चाहूंगा कि वे निरंतर अनुशासित होकर मेहनत करते रहें और अपनी मेहनत पर भरोसा रखें। सफलता अवश्य मिलेगी। सेना में शामिल होने या किसी भी राज्य सेवा में योगदान देने के लिए पूर्ण तैयारी और लगन के साथ प्रयास करें, यही सफलता की कुंजी है।

गढ़वाल राइफल्स का इतिहास गौरवशाली रहा है। कृपया इसके गठन, परंपराओं और वीरता की घटनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी साझा करें ?

रेजिमेंट के गठन का विवरण
1887 से पूर्व गढ़वाली लोग पांच गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होते थे। गढ़वालियों की वीरता एवं कार्यों के प्रति समर्पण को देखते हुए उनके लिए अलग रेजिमेंट की स्थापना का निर्णय लिया गया। 05 मई 1887 को अल्मोड़ा में प्रथम बटालियन का गठन हुआ। 04 नवम्बर 1887 को यह बटालियन अल्मोड़ा से कालुडांडा (लैंसडाउन) पहुंची, जहां इसका नाम परिवर्तन कर ‘गढ़वाल राइफल्स’ कर दिया गया और इसे स्थायी रूप से लैंसडाउन में स्थापित किया गया। गठन से लेकर अभी तक रेजिमेंट ने सभी युद्धों में भाग लिया और गढ़ वीरों ने अपनी वीरगाथा से इतिहास के पन्नों में अपनी गौरवशाली पहचान बनाई है।

रेजिमेंट की प्रथम तथा द्वितीय बटालियन ने प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया। युद्ध में फ्रांस में लड़े गए एक ऑपरेशन के दौरान राइफलमैन गब्बर सिंह ने अद्भुत साहस एवं सर्वोच्च वीरता का प्रदर्शन किया, उन्हें मरणोपरांत ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित किया गया। रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट डब्ल्यू डी केनी को भी 1920 में अफगान ऑपरेशन में बहादुरी व साहस के लिए मरणोपरांत ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित किया गया। 02 फरवरी 1921 को रेजिमेंट को प्रथम विश्व युद्ध में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए ‘रॉयल’ का खिताब मिला और दाहिने कंधे पर ‘रॉयल रस्सी’ पहनने का विशेषाधिकार दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद
(क) विभाजन के समय मुश्किल दिनों में रेजिमेंट ने साम्प्रदायिक दंगों को नियंत्रित करने एवं कानून व्यवस्था स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1947–48 के भारत-पाक युद्ध में तीसरी बटालियन ने ‘तिथवाल’ की लड़ाई में अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन किया। इस लड़ाई में बटालियन को एक महावीर चक्र, 18 वीर चक्र, एक शौर्य चक्र, 19 एमआईडी और बैटल ऑनर ‘तिथवाल’ प्रदान किया गया। यह बटालियन आज भी सबसे अधिक वीरता पदक प्राप्त करने वाली एकमात्र बटालियन है।

(ख) 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चौथी बटालियन ने ‘नूरानांग’ में अभूतपूर्व युद्ध लड़ा, जिसके लिए इसे दो महावीर चक्र और सात वीर चक्र प्रदान किए गए।

यह गढ़वाल राइफल्स की ‘एकमात्र ऐसी बटालियन थी, जिसे पूर्वी क्षेत्र में वीरता के लिए ‘नूरानांग’ युद्ध सम्मान से सम्मानित किया गया। इस युद्ध में राइफलमैन जसवंत सिंह को मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ प्रदान किया गया, जिनकी वीर गाथा और साहस आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं।

(ग) 1965 में प्रथम बटालियन ने ‘गदरा रोड’, दूसरी बटालियन ने ‘ओपी हिल’, छठवीं बटालियन ने ‘फिलोरा’ तथा आठवीं बटालियन ने ‘बुटर डोगरांडी’ में साहसिक युद्ध लड़ा। इस युद्ध में रेजिमेंट के कप्तान सीएन सिंह को मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। प्रथम गढ़वाल राइफल्स और आठवीं गढ़वाल राइफल्स को युद्ध सम्मान ‘बुटर डोगरांडी’ से सम्मानित किया गया तथा छठीं बटालियन को ‘फिलोरा’ युद्ध सम्मान से सम्मानित किया गया।

(घ) 1971 में पांचवीं बटालियन ने बांग्लादेश के ‘हिली’ युद्ध में विशिष्ट वीरता का परिचय दिया। इस युद्ध में बटालियन को तीन वीर चक्र, तीन सेना मेडल, सात एमआईडी एवं युद्ध सम्मान ‘हिली’ से अलंकृत किया गया।

(ङ) रेजिमेंट की सातवीं गढ़वाल तथा नौवीं गढ़वाल राइफल्स ने 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार में भाग लिया। इस ऑपरेशन के दौरान आतंकवादियों के विरुद्ध अदम्य वीरता का परिचय देते हुए नायक भवानी दत्त जोशी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, जिन्हें मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया, जो कि शांतिकाल में देश का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है।

(च) सभी युद्धों के अलावा भी गढ़वाल की बटालियनों ने अन्य कार्यों में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रेजिमेंट ने राष्ट्र के गौरव के लिए आईएस ड्यूटी तथा सीआई ऑपरेशनों में उल्लेखनीय कार्य किए। 1987 के आईपीकेएफ में रेजिमेंट की छह बटालियनों ने योगदान दिया। बहादुरी का कार्य करते हुए ऑपरेशन पवन में रेजिमेंट ने कई युद्ध सम्मान जीते।

(छ) वर्ष 1999 के ‘ऑपरेशन विजय’ कारगिल में रेजिमेंट की तीन बटालियनों और गढ़वाल स्काउट के एक प्लाटून ने हिस्सा लिया। कारगिल युद्ध में 10वीं गढ़वाल राइफल, 121 इन्फेंट्री बटालियन (आर्म्ड) के हिस्से के रूप में डिफेंसिव स्थिति में थी। 17 गढ़वाल राइफल ने बटालिक के सबसेक्टर में साहसिक कार्य किया, जबकि 18 गढ़वाल राइफल ने द्रास सबसेक्टर में युद्ध लड़ा। 18 गढ़वाल राइफल को प्वाइंट 5140 तथा प्वाइंट 4700 की चोटियों पर कब्जा करने के लिए सीओएएस यूनिट साइटेशन से सम्मानित किया गया तथा 10वीं व 17वीं गढ़वाल राइफल्स को जीओसी-इन-सी यूनिट प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया।

रेजिमेंट को ऑपरेशन विजय के दौरान कई सम्मान हासिल हुए। 17वीं तथा 18वीं गढ़वाल राइफल्स को युद्ध सम्मान ‘बटालिक’ एवं ‘द्रास’ और थिएटर ऑनर, ‘कारगिल’ से भी सम्मानित किया गया।

भारतीय सेना के इतिहास में गढ़वाल रेजिमेंट वह पहली रेजिमेंट है जिसका अंतसेना समागम है। गढ़वाल रेजिमेंट अभी 2/3 जीआर से संबंध जोड़े हुए है, जिससे 1891 में ब्रिटिश सरकार ने गढ़वाल रेजिमेंट बनाई थी। 6 मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री जो कि प्रथम गढ़वाल थी, के साथ भी रेजिमेंट संबंधित है। इसके अलावा 02 फरवरी 1990 को रेजिमेंट का संबंध आईएनएस विराट के साथ बंधा और 10 दिसंबर 2005 को 14 स्क्वाड्रन एयर फोर्स के साथ हुआ। रेजिमेंट आर्म्ड की 62 कैवेलरी, 2 लांसर (गार्डनर हॉर्स) तथा 47 आर्म्ड रेजिमेंट से भी संबंधित है।

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