उत्तराखंड के चमोली जिले में जलवायु परिवर्तन का असर अब धरातल पर साफ दिखने लगा है। कभी जल की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध यह इलाका अब सूखते जलस्रोतों की पीड़ा झेल रहा है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के एक ताजा शोध के अनुसार, जिले के करीब 40 प्रतिशत पारंपरिक जलस्रोत अब या तो मौसमी बन गए हैं या पूरी तरह सूख चुके हैं।
भूगोल विभाग की शोधार्थी मंजू आर्या द्वारा माथुगाड़ जलागम क्षेत्र में किए गए अध्ययन में पाया गया कि 1965 से 2022 के बीच स्थायी धाराओं की कुल लंबाई 56.39 किमी से घटकर सिर्फ 40.92 किमी रह गई, यानी लगभग 15.47 किमी धाराएं सूख गईं। यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों की जीवनरेखा पर सीधा असर डाल रहा है।
शोध के अनुसार, तापमान में निरंतर वृद्धि, अनियमित मानसूनी वर्षा, वनों की कमी, मिट्टी का कटाव और कृषि भूमि का परित्याग इस संकट की मुख्य वजहें हैं। पहाड़ी इलाकों में पहले जहां नाले, नौले और धाराएं गांवों की प्यास बुझाते थे, वहीं अब कई जगह लोग पानी के लिए किलोमीटरों दूर जाने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराएगा। मंजू आर्या ने सुझाव दिया है कि जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण क्षेत्रों का विकास और समुदाय आधारित जल प्रबंधन इस समस्या से निपटने की कुंजी हैं। उन्होंने बताया कि वर्षा जल संचयन, चेकडैमों और छोटे बांधों का निर्माण, साथ ही स्रोतों के कैचमेंट क्षेत्र में पौधरोपण जैसी पहलें जल सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं। गांव-स्तर पर जल संरक्षण समितियों की भूमिका भी अहम बताई गई है।

माथुगाड़ जलागम की प्रमुख नदियों में दुखतुंग गाड़, टोटी गदेरा, रसोई गाड़, हिनवालघाट गाड़, कुराली गदेरा, गुची गदेरा और पश्चिमी रामगंगा की उप-नदियां शामिल हैं, जो अब खुद अस्तित्व के संकट से गुजर रही हैं।अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो चमोली की धाराएं केवल नक्शों में रह जाएंगी।पानी बचाना अब विकल्प नहीं, भविष्य की एकमात्र जरूरत बन चुका है।



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