पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपनी जीवन-यात्रा और भारतीय न्यायपालिका की चुनौतियों पर प्रकाश ड़ाला। कानून में रुचि जगाने वाले साहित्य से लेकर सुप्रीम कोर्ट की अवसंरचना की वास्तविकताओं तक उन्होंने हर पहलू को बेबाकी से रखा। अदालतों में तकनीक, सरल भाषा और महिलाओं की सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे आज भी सुधार की प्रतीक्षा में हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी सिर्फ़ कानून का सिंहासन नहीं यह देश के हर तबके को जोड़ने वाली ज़िम्मेदारी, संघर्ष और इंसानी संवेदनाओं की कहानी हैं।
कानून में दिलचस्पी कैसे जगी
पूर्व CJI बताते हैं कि शुरुआत में वे अर्थशास्त्र में ऑनर्स करना चाहते थे, क्योंकि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में टॉप किया था। लेकिन साहित्य ने उन्हें न्याय और अन्याय का वास्तविक अर्थ समझाया। प्रेमचंद्र की गबन ने बताया कि पुलिस कैसे बच निकलती है, और साहित्य ने उन्हें बार-बार अपने “कम्फर्ट ज़ोन” से बाहर आने को मजबूर किया। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में कविता और साहित्य पढ़ना उनकी सोच की नींव बना।

CJI बनने की सबसे बड़ी चुनौती
उनके अनुसार, देश का CJI बनना नेतृत्व का सबसे कठिन रूप है, क्योंकि आपको अन्य जजों की तरह ही काम करते हुए, पूरे न्याय तंत्र को साथ लेकर चलना होता है। सुप्रीम कोर्ट के 37,000 मामलों को हिंदी में अनुवाद करना एक बड़ा कदम रहा। अलग-अलग राज्यों से आने वाले जजों और वकीलों की परतें जोड़कर एक साथ काम कराना उनका सबसे बड़ा चैलेंज था।
कानून और ज़िंदगी का अनोखा संगम
उन्होंने बताया कि कानून सिर्फ़ धाराओं का खेल नहीं यह ज़िंदगी का हिस्सा है। वे उस लेखक की टीम में भी थे, जिसने नेल्सन मंडेला के साथ दक्षिण अफ्रीका में काम किया और बाद में अफ्रीकी कोर्ट के जज बने। यह अनुभव उन्हें कानून की अंतरराष्ट्रीय आत्मा को समझने में मदद करता है।
भारत की पहचान गाँवों में
वे मानते हैं कि असली भारत गाँवों और कस्बों में बसा है, जहाँ पहचान साहित्य, भाषा और संस्कृति से बनती है। फ़ेडरल ढाँचा इन पहचानों का सम्मान करता है। हम सब अलग हैं, लेकिन संविधान की छतरी तले भारतीय हैं।

भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी समस्या
उनके अनुसार सबसे गंभीर मुद्दा है “तारीख़ पे तारीख़” वाली प्रणाली, यानी pending cases की भारी संख्या। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पाया कि अवसंरचना बेहद कमजोर है।
- महिलाओं जजों के लिए पर्याप्त टॉयलेट नहीं
- सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के लिए शौचालय की कमी
- सैनिटरी पैड उपलब्ध नहीं
- मासिक धर्म स्वच्छता पर ध्यान नहीं
वे कहते हैं “इस ढांचे को सुधारे बिना न्याय बेहतर नहीं हो सकता।”
तकनीक की जरूरत
अदालतों में तकनीक का दायरा बढ़ना चाहिए। डिजिटाइजेशन अभी भी अधूरा है।
लोगों और अदालत के बीच दूरी
वे बताते हैं कि भारतीय न्यायपालिका में “परतों की कमी” है यानि वह सुविधा, संवाद और सरलता जो नागरिकों को कोर्ट से जोड़ती है, वह अभी भी कमजोर है।
निर्णय लिखने से पहले एक सवाल
वे हर जजमेंट लिखने से पहले खुद से पूछते थे “मैं किसके लिए लिख रहा हूँ?”उनका जवाब हमेशा एक ही था “नागरिकों के लिए।” इसलिए वे भाषा को सरल रखते। सुप्रीम कोर्ट के पास एक कम्युनिकेशन टीम है, जो पूरे फैसले को नागरिकों की भाषा में ढालती है सरल लेकिन कानूनी।
पत्नी का सहयोग
उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी पत्नी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहीं उनके सफ़र का कारण और सहारा।
सबरीमाला केस का ज़िक्र
उन्होंने कहा कि सबरीमाला विवाद में 18 से 50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश प्रतिबंधित था, और यह मामला भारतीय समाज में अधिकारों और परंपरा के बीच संघर्ष का प्रतीक बन गया।








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