देहरादून में नियो मेट्रो के स्थान पर अब दूसरा रैपिड ट्रांजिट सिस्टम लाने की दिशा में बड़ा कदम उठा है। केंद्र सरकार की सलाह के बाद राज्य मंत्रिमंडल ने इस प्रणाली पर विस्तृत अध्ययन की मंजूरी दे दी है। शहर की बढ़ती आबादी, जाम और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए यह सिस्टम नियो मेट्रो से अधिक बेहतर और टिकाऊ माना जा रहा है। यह निर्णय देहरादून की ट्रैफिक कहानी में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
देहरादून की सड़कों पर हर दिन वही कहानी दोहराई जाती है भीड़, सायरन, धूप में पिघलती बाइक की कतारें और बसों में ठसाठस भरे लोग। ऐसे में हर दूनवासी के मन में एक ही सवाल था क्या कभी शहर को ऐसा पब्लिक ट्रांसपोर्ट मिलेगा जो इस भागदौड़ को थोड़ा आसान बना दे? इसी उम्मीद के बीच एक नई जानकारी सामने आई नियो मेट्रो की जगह अब देहरादून में रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RTS) पर अध्ययन किया जाएगा।

यह फैसला अचानक नहीं आया। केंद्र ने पहले ही मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन से परामर्श लिया था और बताया था कि नियो मेट्रो जैसी प्रणाली देहरादून जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए भविष्य में पर्याप्त नहीं होगी। इसके बाद राज्य मंत्रिमंडल ने भी इस राय से सहमति जताते हुए RTS प्रणाली पर विस्तृत अध्ययन को मंजूरी दे दी। रैपिड ट्रांजिट सिस्टम न सिर्फ तेज़ है, बल्कि अधिक कैपेसिटी वाला, टिकाऊ और भविष्य की शहरी जरूरतों के अनुसार ढला हुआ माना जाता है। शहर के भीड़भाड़ वाले कॉरिडोर घंटाघर से रायवाला, आईएसबीटी से राजपुर जैसे रूटों पर यह व्यवस्था दून की ट्रैफिक कहानी को पूरी तरह बदल सकती है।

नियो मेट्रो को लेकर पहले कई तरह के सवाल थे कम क्षमता, भविष्य में संचालन लागत बढ़ना और भीड़ को संभाल पाने की सीमाएँ। अब RTS के अध्ययन से यह साफ होगा कि शहर को किस तरह का सिस्टम सबसे उपयुक्त रहेगा। राज्य सरकार का मानना है कि देहरादून जैसे शहर में लंबी अवधि तक टिकने वाला ट्रांसपोर्ट सिस्टम वही है जो आने वाले 20–25 साल की आबादी को ध्यान में रखकर बनाया जाए। इस बीच लोगों के बीच उम्मीद भी बढ़ी है। पटेलनगर में रहने वाली सीमा ने कहा “अगर नया सिस्टम भीड़ कम कर दे और सफर आसान कर दे, तो हमारे रोज़ के दो घंटे बच जाएंगे।” वहीं कई विद्यार्थियों का मानना है कि बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट न सिर्फ सफर बल्कि करियर की दिशा भी बदल देता है।
देहरादून उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ फैसला सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की रोज़मर्रा की जिंदगी का है। और रैपिड ट्रांजिट सिस्टम पर यह अध्ययन उसी नए अध्याय की शुरुआत जैसा है। सवाल बस इतना है क्या दून की रफ्तार अब सचमुच बदलने वाली है? आने वाले महीनों में इसका जवाब शहर खुद देगा।








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