भूकंप आया तो बदल जाएगा रामनगर का नक्शा: कोसी से मिल सकती है दाबका नदी, वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी

भूकंप आया तो बदल जाएगा रामनगर का नक्शा: कोसी से मिल सकती है दाबका नदी, वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी

रामनगर के कोसी और दाबका नदी क्षेत्र में भूकंप से बड़ा भू-परिवर्तन संभव है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी बड़े भूकंप की स्थिति में दाबका नदी का बहाव बदलकर कोसी से मिल सकता है। आईआईटी कानपुर और वैज्ञानिकों की नई स्टडी में फॉल्ट लाइन पर बड़े निर्माण को गंभीर खतरा बताया गया है।

अगर रामनगर में बड़ा भूकंप आया, तो सिर्फ दीवारें नहीं नक्शे तक बदल सकते हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जमीन के नीचे छिपी हलचल, दो नदियों को एक बना सकती है…उत्तराखंड का रामनगर क्षेत्र अपनी खूबसूरत नदियों कोसी और दाबका के लिए जाना जाता है। लेकिन भू-वैज्ञानिकों की नई शोध रिपोर्ट ने इस शांत इलाके के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस क्षेत्र में एक बड़ा भूकंप आता है, तो इससे यहां का पूरा लैंडस्केप बदल सकता है। सबसे बड़ी आशंका यह है कि दाबका नदी का बहाव बदलकर सीधा कोसी नदी से मिल सकता है।

आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने हाल ही में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में आयोजित कार्यशाला में यह निष्कर्ष साझा किए। डॉ. जावेद मलिक सहित कई प्रमुख वैज्ञानिकों का मानना है कि रामनगर क्षेत्र में कई नई फॉल्ट लाइनों के संकेत मिले हैं, जिनमें कालाढूंगी फॉल्ट लाइन प्रमुख है।
 दाबका और बोअर नदी के बहाव क्षेत्र में बदलाव के संकेत
वैज्ञानिकों ने बताया कि समय के साथ दाबका और कोसी नदियों के बहाव में अंतर देखा गया है और यह बदलाव प्राकृतिक नहीं बल्कि भूगर्भीय हलचलों का परिणाम हो सकता है। अध्ययन के अनुसार:
•दाबका और बोअर नदी के बहाव में पहले के मुकाबले बड़ा परिवर्तन दर्ज हुआ है।
•यह दोनों नदियाँ अब जिस दिशा में बह रही हैं, वह पिछले भूगर्भीय पैटर्न से अलग है।
•बड़े भूकंप की स्थिति में इनका मार्ग और तेजी से बदल सकता है।
डॉ. जावेद मलिक कहते हैं कि इन परिवर्तनों को समझना जरूरी है, क्योंकि यह संकेत एक बड़े लैंडस्केप चेंज का हिस्सा हो सकते हैं।
कालाढूंगी फॉल्ट लाइन- 50 किमी लंबी सक्रिय दरार
रिपोर्ट में बताया गया है कि कालाढूंगी फॉल्ट लाइन लगभग 50 किमी लंबी है और यही फॉल्ट थ्रस्ट (मुख्य फॉल्ट) का हिस्सा मानी जा रही है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार:
•1505 और •1803 के भीषण भूकंप इसी फॉल्ट लाइन से जुड़े थे। इन दोनों भूकंपों ने उत्तराखंड के भू-आकृतिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया था। अब एक बार फिर वैज्ञानिक इस क्षेत्र के प्रति सतर्क हैं।
फॉल्ट लाइन पर बड़े निर्माण को वैज्ञानिकों ने बताया खतरनाक
अध्ययन में यह बात स्पष्ट हुई कि फॉल्ट लाइन के ऊपर या उसके आसपास भारी निर्माण (Big Construction) घातक साबित हो सकता है।
फॉल्ट लाइन वह जगह होती है जहां पृथ्वी की दो टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे के संपर्क में होती हैं। जब इनमें ऊर्जा का संचय होता है, तो यह अचानक फट जाती हैं—और भूकंप आता है। वैज्ञानिकों ने कहा कि:
•पहले जिन जगहों को फॉल्ट लाइन का हिस्सा माना जा रहा था, अब उसके सटीक लोकेशन की पहचान शुरू कर दी गई है।
•कई ऐसे इलाके सामने आए हैं जहां बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है—जो जोखिम को कई गुना बढ़ा सकता है।
अगर आया बड़ा भूकंप- तो क्या होगा?
रिपोर्ट स्पष्ट कहती है कि बड़े भूकंप की स्थिति में सबसे बड़ा परिवर्तन नदी प्रणालियों में दिख सकता है।
संभावित परिणाम:
•दाबका नदी अपना रुख मोड़कर सीधे कोसी नदी की धारा से मिल सकती है।
•नदी के मार्ग बदलने से पूरा भू-भाग पुनर्गठित हो सकता है।
•निचले क्षेत्रों में बाढ़ और मिट्टी खिसकने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि ये भू-परिवर्तन सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे तराई क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। उत्तराखंड की जमीन उतनी शांत नहीं जितनी दिखती है। नदियों का बहाव बदलना, नई फॉल्ट लाइनों का उभरना और लगातार हो रही टेक्टोनिक गतिविधियां साफ संकेत देती हैं कि भविष्य में किसी बड़े भूकंप का खतरा टाला नहीं जा सकता। प्रकृति बदलाव का संकेत दे रही है अब फैसला हमें करना है कि हम इसे समय रहते समझेंगे या अनदेखा करेंगे।
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