लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा भारतीय सेना के उन चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों में शामिल हैं, जिनके लिए रैंक शक्ति का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक है। तीन सितारा पद तक पहुँचने के बावजूद उनके भीतर का सेवाभाव कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने हर जिम्मेदारी को अधिकार की तरह नहीं, बल्कि कर्तव्य की भावना से निभाया—और यही सोच उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
अपने लंबे और विविध सैन्य करियर में उन्होंने ऐसे क्षेत्रों में नेतृत्व किया, जहाँ निर्णय केवल सैन्य नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय असर भी रखते हैं। असम राइफल्स के महानिदेशक के रूप में उन्होंने उत्तर-पूर्व भारत की सुरक्षा व्यवस्था को न केवल मजबूत किया, बल्कि उसे अधिक संवेदनशील, संवादपरक और भरोसेमंद भी बनाया। स्थानीय समुदायों के साथ विश्वास का रिश्ता बनाना उनके नेतृत्व की केंद्रीय धुरी रहा।
जम्मू-कश्मीर और सीमावर्ती इलाकों में उनके मार्गदर्शन में कई जटिल और संवेदनशील अभियानों को सफलता मिली। इन अभियानों की खास बात यह रही कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ आम नागरिकों के जीवन और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यही कारण है कि उनके नेतृत्व ने केवल सुरक्षा तंत्र को नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को भी मजबूत किया।
आतंकवाद-रोधी अभियानों में उनकी रणनीति संतुलित, सटीक और दूरदर्शी रही। उनके लिए बल का प्रयोग हमेशा अंतिम विकल्प रहा, जबकि शांति और संवाद पहली प्राथमिकता। वे मानते हैं कि स्थायी सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और विश्वास से आती है। यह दृष्टिकोण उन्हें एक सफल सैन्य कमांडर के साथ-साथ एक दूरदर्शी नेता भी बनाता है।
लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा वास्तव में उस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सामर्थ्यवान भी है, संवेदनशील भी और अपने मूल्यों के प्रति अडिग भी।
उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM) और सेना मेडल जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। हालांकि, ये सम्मान उनके योगदान की औपचारिक पहचान भर हैं। उनका असली सम्मान उन सैनिकों और नागरिकों के दिलों में बसा भरोसा है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में उन्हें अपने साथ खड़ा पाया।
लेफ्टिनेंट जनरल लखेड़ा का नेतृत्व डर पर नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित है। वे जानते हैं कि सेना की असली ताकत हथियारों में नहीं, बल्कि जवानों के आत्मबल और चरित्र में होती है। इसलिए वे आदेश देने से पहले समझाते हैं और आगे बढ़ने से पहले साथ चलने में विश्वास रखते हैं।
वे यह सिखाते हैं कि नेतृत्व ऊँची आवाज़ से नहीं, ऊँची सोच से बनता है, और अनुशासन कठोरता नहीं, बल्कि आत्मसंयम होता है। यदि आज का युवा उनके जीवन और नेतृत्व से प्रेरणा ले, तो न केवल उसका भविष्य उज्ज्वल होगा, बल्कि राष्ट्र भी अधिक सशक्त और मूल्यनिष्ठ बनेगा।


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