नरेंद्र सिंह नेगी उत्तराखंड की वह आवाज़ हैं, जिसे सुनते ही पहाड़ बोलने लगता है। उनकी गायकी केवल संगीत नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृति, संघर्ष और आत्मा का दस्तावेज़ है। जब मुख्यधारा का संगीत बाज़ार और ट्रेंड्स के पीछे भागता है, तब नेगी जी की आवाज़ ज़मीन से उठती है, उसी ज़मीन से, जहाँ से पहाड़ का जीवन, उसकी पीड़ा और उसकी उम्मीदें जन्म लेती हैं।
उनके गीतों में चमक-दमक नहीं, सच्चाई है। न कोई बनावटी शोर, न नाटकीय प्रस्तुति, बस गहरी संवेदना। यही वजह है कि उनकी आवाज़ हर पीढ़ी को अपनी लगती है। उनके सुरों में गाँव की पगडंडियाँ, खेतों की मिट्टी, पहाड़ का सन्नाटा और लोगों का संघर्ष साफ महसूस होता है। वे लोक को अतीत में बंद नहीं करते, बल्कि उसे वर्तमान से जोड़कर ज़िंदा रखते हैं।
12 अगस्त 1949 को पौड़ी गढ़वाल ज़िले के पौड़ी गाँव में जन्मे नरेंद्र सिंह नेगी का बचपन उसी लोकसंस्कृति में रचा-बसा, जिसे आगे चलकर उन्होंने अपनी पहचान बना लिया। प्रारंभिक शिक्षा भी पौड़ी क्षेत्र में ही हुई। बचपन में मेलों, जागरों, लोकगीतों और ढोल-दमाऊ की धुनों के बीच उन्होंने जीवन को समझा। यही अनुभव उनके संगीत की आत्मा बन गया।
नेगी जी ने संगीत को कभी सत्ता, शोहरत या पुरस्कार का साधन नहीं बनाया। उन्होंने इसे समाज से संवाद करने और समाज से सवाल पूछने का माध्यम बनाया। उनके गीत सिर्फ भावुक नहीं करते, बल्कि सोचने पर मजबूर करते हैं। पलायन, बेरोज़गारी, पर्यावरण विनाश, राजनीतिक छल, सामाजिक विसंगतियाँ — उनके गीत इन सब पर सीधे और ईमानदार सवाल खड़े करते हैं।
जब पहाड़ से लोग पलायन कर रहे थे, नेगी जी ने उसे गीतों में दर्ज किया। जब नदियाँ और जंगल खतरे में थे, उनकी आवाज़ चेतावनी बन गई। जब राजनीति ने पहाड़ को केवल वोट समझा, तब उनके गीतों ने सच सामने रखा। इसीलिए वे सिर्फ गायक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी निभाते हैं।
उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं, बल्कि चेतना है। निराशा नहीं, बल्कि उम्मीद है। वे पहाड़ को केवल गाते नहीं, बल्कि समझाते भी हैं। उनके गीत हमें बताते हैं कि संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पहचान और आत्मसम्मान होती है।
आज जब बहुत कुछ बदल गया है, तब भी नरेंद्र सिंह नेगी की आवाज़ वैसी ही है, ईमानदार, स्थिर और सच्ची। यही कारण है कि वे सिर्फ कलाकार नहीं, उत्तराखंड की जन-आवाज़ कहलाते हैं।


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