उत्तराखंड को मिली उदयपुरी बकरी की एक नई नस्ल

उत्तराखंड को मिली उदयपुरी बकरी की एक नई नस्ल

विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग में कार्यरत डॉ. आर.एस. बरवाल, डॉ. सी.वी. सिंह और डॉ. बी.एन. शाही की टीम ने उदयपुरी बकरी की नस्ल को आईसीएआर-एनबीएजीआर, करनाल द्वारा उत्तराखंड की एक विशिष्ट नस्ल के रूप में आधिकारिक तौर पर बकरी के तैतालिसवां प्रजाति के रूप में मान्यता दिला दी है।

वैज्ञानिक दल इस बकरी के प्रजनन क्षेत्र में विस्तृत आधारभूत सर्वेक्षण कार्य में लगे थे और जून, 2025 के महीने में एनबीएजीआर, करनाल द्वारा नियुक्त वैज्ञानिकों की एक टीम ने उदयपुरी बकरी के प्रजनन क्षेत्र का दौरा किया, जिसके परिणामस्वरूप अंतः इस नस्ल का पंजीकरण हुआ।

इस बकरी का मूल क्षेत्र उत्तराखंड प्रदेश के पश्चिम हिमालयी क्षेत्र उदयपुरी एवं अजमेरी पट्टी यानी दुगड्डा से यमकेश्वर तक, जिला पौड़ी गढ़वाल में स्थित है। ये बकरियां समशीतोष्ण जलवायु के अनुकूल हैं। यह नस्ल आकार में छोटी होती है और मांस उत्पाद के लिए पाली जाती है। उदयपुरी बकरियां मध्यम आकार, भूरे रंग, सुगठित शरीर जिनके ऊपरी भाग पर काली धारियां पाई जाती हैं, सिर थोड़ा उभरा हुआ होती हैं तथा माथे पर काले बाल होते हैं, पतली थूथन, चमकीली आंखें एवं काली नाक होती है, कान लटके हुए होते हैं तथा वेटल व दाढ़ी अनुपस्थित रहती है, सींग मध्यम आकार के चपटे, नुकीले तथा बाहर को पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। उदयपुरी बकरियां मांस के लिए पाली जाती हैं, नर और मादा का वयस्क शरीर भार क्रमशः 26-30 किलोग्राम तथा 21-25 किलोग्राम होता है।

इस बकरी की नस्ल को गढ़वाल मंडल के बकरी पालकों द्वारा मांस के उद्देश्य से पाला जा रहा है और यह उनकी कृषि आय में पूरक है। उदयपुरी बकरियां स्थानीय बकरी पालकों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर इन्हें बाजार में बेच दिया जाता है तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भी इनका उपयोग किया जाता है।

एक नस्ल के रूप में इसे मान्यता मिलने से बकरी पालकों को बकरियों के सुधार एवं संरक्षण के माध्यम से इसकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने का रास्ता खुल गया है, ताकि इसे अधिक लाभकारी बनाया जा सके। पशुपालन विभाग, उत्तराखंड अब इसके आगे के सुधार और संरक्षण के लिए इसे राज्य बकरी प्रजनन नीति में मान्यता प्राप्त बकरी नस्ल के रूप में शामिल कर सकता है। कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान, निदेशक शोध डॉ. एस.के. वर्मा एवं अधिष्ठाता डॉ. ए.एच. अहमद आदि ने वैज्ञानिकों के सार्थक प्रयास एवं सफलता के लिए बधाई दी।

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