उत्तराखंड आज सामाजिक असंतोष और कानून-व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा है। राज्य में बढ़ती घटनाएँ यह संकेत दे रही हैं कि सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक सतर्कता कमजोर हुई है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन आज भी बहुत से लोगों को लगता है कि न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की कमी रही। यह मामला महिला सुरक्षा पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है।
वहीं देहरादून में एंजेल चकमा की हत्या ने बाहरी छात्रों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भय पैदा किया है। ऐसे मामलों में पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई धीमी और अस्पष्ट रही, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। कई बार पुलिस राजनीतिक दबाव, आंतरिक खींचतान और संसाधनों की कमी के कारण प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाती।
ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में पुलिस की पहुंच आज भी सीमित है, जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। जनता को लगता है कि शिकायतों पर समय पर सुनवाई नहीं होती। जनता बार-बार सड़क पर उतरकर न्याय की मांग कर रही है, जो प्रशासन पर बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है। सोशल मीडिया आज न्याय की आखिरी उम्मीद बनता जा रहा है, यह भी व्यवस्था की विफलता का संकेत है।
महिलाओं, छात्रों और पर्यटकों की सुरक्षा राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। उत्तराखंड को आज एक संवेदनशील, निष्पक्ष और जवाबदेह पुलिस तंत्र की आवश्यकता है। पुलिस सुधार केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव से होगा। जवाबदेही तय किए बिना सुधार संभव नहीं है। अब समय आ गया है कि सरकार केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रोकथाम की नीति अपनाए, ताकि जनता का भरोसा फिर से बहाल हो सके।









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