Tuesday , 15 September 2026
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ललित – उत्तराखंड की मिटती काष्ठ-कला के मौन रक्षक

अल्मोड़ा ज़िले के पिओरा क्षेत्र का एक छोटा-सा गांव है — डायरी। पहाड़ों की गोद में बसा यह गांव बाहर से जितना शांत दिखता है, इसके भीतर उतनी ही गहरी सांस्कृतिक धड़कन छुपी है। इसी गांव में रहते हैं ललित, जो आज भी लकड़ी पर हाथ से पारंपरिक उत्तराखंडी डिज़ाइन तराशते हैं। मशीनों और तेज़ उत्पादन के इस दौर में वे उन गिने-चुने कारीगरों में से हैं, जो इस दुर्लभ और बहुमूल्य कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं।

ललित की यह कला किसी संस्थान या आधुनिक प्रशिक्षण का परिणाम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक और व्यवहारिक परंपरा की देन है। उन्होंने यह हुनर स्वर्गीय गंगाराम से सीखा था, जो अपने समय के प्रसिद्ध पारंपरिक काष्ठ-कारीगर माने जाते थे। गुरु-शिष्य की उस परंपरा में न कोई सर्टिफिकेट था, न तय समय, केवल धैर्य, अभ्यास और लकड़ी के साथ संवाद।

आज ललित उसी विरासत को पूरी लगन, सटीकता और निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। चाहे पुराने पारंपरिक डिज़ाइनों को दोहराना हो — जैसे मंदिरों, घरों की चौखटों, खिड़कियों और बालकों में दिखने वाले पारंपरिक पैटर्न या फिर नए बॉर्डर और डिज़ाइन गढ़ने हों, वे हर काम को उतनी ही बारीकी और सम्मान के साथ करते हैं। उनके हाथों में छेनी और हथौड़ी केवल औज़ार नहीं, बल्कि स्मृतियों और परंपराओं के वाहक हैं।

गांव के एक छोटे-से शेड में बैठकर वे रोज़ घंटों मेहनत करते हैं। लकड़ी की खुशबू, धीमी ठक-ठक की आवाज़ और उकेरते हुए डिज़ाइन, यही उनकी दिनचर्या है। लेकिन इस कला के साथ सबसे बड़ी चुनौती है आजीविका। मशीन से बने सस्ते डिज़ाइन और बाज़ार की बदलती प्राथमिकताओं के कारण हाथ से किए गए काम की मांग लगातार घटती जा रही है। ललित मानते हैं कि वे अभी अपनी मेहनत और कौशल के अनुसार उतनी आमदनी नहीं कमा पा रहे हैं, जितनी मिलनी चाहिए।

उनका कहना है कि यदि उन्हें स्थानीय स्तर पर अधिक और नियमित ऑर्डर मिलें, तो वे न केवल अच्छा काम कर सकते हैं, बल्कि अपने परिवार की रोज़ी-रोटी भी सम्मानजनक ढंग से चला सकते हैं। नियमित काम मिलने से यह कला केवल शौक या संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक जीवित पेशा बनी रहेगी।

ललित यह भी बताते हैं कि अब तक उन्हें किसी सरकारी योजना से वास्तविक और ज़मीनी लाभ नहीं मिला है। कागज़ी योजनाएं और घोषणाएं तो बहुत हैं, लेकिन पारंपरिक कारीगरों तक उनका असर बहुत कम पहुंच पाता है। न तो बाज़ार से जुड़ाव है, न आधुनिक डिज़ाइन प्रशिक्षण, न ही आर्थिक सुरक्षा।

ऐसे कारीगर किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं होते — वे हमारी लोक-संस्कृति, पहचान और स्मृति के संरक्षक होते हैं। इनके हाथों से बनी चीज़ें केवल लकड़ी के टुकड़े नहीं, बल्कि समय की छाप होती हैं। यदि आज ललित जैसे कारीगर काम छोड़ने को मजबूर हुए, तो आने वाली पीढ़ियां इस कला को केवल किताबों या तस्वीरों में देखेंगी।

इसलिए ज़रूरत है कि स्थानीय सरकार, संस्थान और समाज मिलकर ऐसे कलाकारों को आर्थिक सहयोग, प्रशिक्षण और बाज़ार तक सीधी पहुंच दें। साथ ही, हम आम लोग भी यदि अपने घरों, मंदिरों, होमस्टे, या निर्माण कार्यों में स्थानीय कारीगरों को प्राथमिकता दें, तो यह विरासत अपने आप संवर सकती है।

आइए, हम सब मिलकर ललित जैसे कारीगरों को अधिक काम देकर उनका साथ दें, ताकि लकड़ी में बसती यह संस्कृति सिर्फ अतीत की कहानी न बन जाए, बल्कि भविष्य की पहचान बनी रहे।

Written by
Hill Mail

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