रानीखेत की बेटी तृप्ति बेलवाल ने ऐपण कला को बनाया स्वरोजगार का सशक्त माध्यम

रानीखेत की बेटी तृप्ति बेलवाल ने ऐपण कला को बनाया स्वरोजगार का सशक्त माध्यम

ऐपण बचपन से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों और पारिवारिक आयोजनों में घर की महिलाओं को पारंपरिक लाल गेरू और चावल के घोल से सुंदर आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस कला को सीखा। समय के साथ उन्होंने इसे केवल पारंपरिक आंगन और चौकी तक सीमित न रखकर कैनवास, लकड़ी की प्लेट, दीवार सज्जा, उपहार सामग्री और कॉर्पोरेट गिफ्ट आइटम्स तक विस्तार दिया।

रानीखेत (जनपद अल्मोड़ा) की प्रतिभाशाली बेटी तृप्ति बेलवाल ने उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को नया जीवन देकर इसे स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बना दिया है। मूल रूप से पहाड़ की संस्कृति से जुड़ी तृप्ति आज देहरादून में रहकर न केवल अपनी आजीविका चला रही हैं, बल्कि लोककला संरक्षण और महिला सशक्तिकरण की मिसाल भी बन गई हैं।

शौक से स्वरोजगार तक का सफर

तृप्ति बताती हैं कि ऐपण बचपन से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों और पारिवारिक आयोजनों में घर की महिलाओं को पारंपरिक लाल गेरू और चावल के घोल से सुंदर आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस कला को सीखा। समय के साथ उन्होंने इसे केवल पारंपरिक आंगन और चौकी तक सीमित न रखकर कैनवास, लकड़ी की प्लेट, दीवार सज्जा, उपहार सामग्री और कॉर्पोरेट गिफ्ट आइटम्स तक विस्तार दिया।

उन्होंने सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर अपने उत्पादों को बाजार तक पहुंचाया। देखते ही देखते उनके बनाए ऐपण डिज़ाइन लोगों को पसंद आने लगे और ऑर्डर मिलने शुरू हो गए। आज वे कस्टमाइज्ड पेंटिंग, विवाह-उपहार, नामपट्ट और धार्मिक प्रतीकों पर आधारित विशेष डिजाइन तैयार करती हैं।

पारंपरिक कला को आधुनिक पहचान

ऐपण, जो मुख्यतः कुमाऊं क्षेत्र की लोककला है, पहले घरों की देहरी और पूजा स्थलों तक सीमित थी। तृप्ति ने इसमें आधुनिक रंग संयोजन, नए डिजाइन और उपयोगी उत्पाद जोड़कर इसे समकालीन स्वरूप दिया। उनके काम में पारंपरिक ‘लक्ष्मी चौकी’, ‘सरस्वती चौकी’ और विभिन्न मांगलिक प्रतीकों की झलक आधुनिक सौंदर्यबोध के साथ दिखाई देती है।

महिला सशक्तिकरण की मिसाल

तृप्ति का मानना है कि जब महिलाएं आत्मनिर्भर बनती हैं तो परिवार और समाज दोनों मजबूत होते हैं। उन्होंने आसपास की महिलाओं को भी इस कला का प्रशिक्षण देना शुरू किया है, जिससे कई महिलाएं घर बैठे आय अर्जित कर रही हैं। उनका प्रयास स्थानीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

तृप्ति की सफलता यह दर्शाती है कि स्थानीय कला और परंपराओं में भी अपार संभावनाएं छिपी होती हैं। यदि हुनर, आत्मविश्वास और सही दिशा मिले तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं। आज वे युवाओं, विशेषकर पहाड़ की बेटियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं।

सरकार से अपेक्षाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोककला से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, विपणन सहायता, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच और आसान ऋण सुविधा उपलब्ध कराई जाए, तो यह क्षेत्र बड़े स्तर पर रोजगार सृजन कर सकता है। सरकार और समाज के संयुक्त प्रयास से उत्तराखंड की ऐपण जैसी लोककलाएं राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान भी हासिल कर सकती हैं।

तृप्ति बेलवाल का यह प्रयास केवल एक व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त अभियान है।

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