उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया क्षेत्र से एक प्रेरणादायक पहल सामने आई है, जहां सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह बिष्ट ने जल संरक्षण और प्रकृति संरक्षण के लिए एक जनभागीदारी आधारित अभियान शुरू किया है।
पहाड़ों में तेजी से बढ़ते जल संकट और सूखते प्राकृतिक स्रोतों को देखते हुए उन्होंने संडे फॉर मदर नेचर नाम से एक अभियान की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य लोगों को प्रकृति के प्रति जागरूक करना और सामूहिक श्रमदान के माध्यम से जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना है।
छानी गांव के जंगलों में हुआ श्रमदान
इस अभियान के तहत हाल ही में चौखुटिया क्षेत्र के छानी गांव के जंगलों में जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया गया। इस दौरान स्थानीय युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर जंगलों में ‘खाल’ निर्माण किया।
खाल पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक जल संरक्षण की एक महत्वपूर्ण तकनीक है। ये छोटे-छोटे गड्ढे या जल संरचनाएं होती हैं, जिनका उद्देश्य वर्षा के पानी को रोकना और उसे जमीन में समाहित करना होता है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और आसपास के प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित होने में मदद मिलती है।
हिमगिरि वॉरियर और मासी अंचल की भागीदारी
इस अभियान में हिमगिरि वॉरियर और मासी अंचल के कई साथियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी ने सामूहिक रूप से श्रमदान किया और जंगलों में खाल निर्माण का कार्य पूरा किया।
इस अभियान में हिमगिरि परिवार के कई सदस्य सक्रिय रूप से जुड़े रहे, जिनमें जीवन कठायत, सुरेश उत्तराखंडी, गौरव, सुंदर, सुजल, लक्ष्य, मनीष और युगल सहित कई अन्य साथियों ने भागीदारी निभाई। सभी ने मिलकर टीमवर्क के साथ इस कार्य को सफल बनाया।
पहाड़ों में जल संकट की चुनौती
हिमालयी क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में जल संकट गंभीर होता जा रहा है। कई पारंपरिक जल स्रोत जैसे धार, नौले और गधेरे सूखते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित विकास और जंगलों की घटती संख्या ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।
ऐसे में स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण के प्रयास बेहद जरूरी हो गए हैं। खाल निर्माण जैसी पारंपरिक तकनीकें इस संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
समाज की भागीदारी क्यों जरूरी है
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी होती है। जब लोग स्वयं आगे आकर श्रमदान करते हैं और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी महसूस करते हैं, तभी स्थायी बदलाव संभव हो पाता है।
छानी गांव के जंगलों में किया गया यह श्रमदान इसी सामूहिक चेतना और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक है। यह पहल न केवल जल संरक्षण का काम कर रही है बल्कि युवाओं को भी पर्यावरण संरक्षण से जोड़ रही है।
एक छोटा कदम, बड़े बदलाव की उम्मीद
शंकर सिंह बिष्ट और उनके साथियों की यह पहल यह संदेश देती है कि यदि समाज के लोग मिलकर प्रकृति की रक्षा के लिए आगे आएं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़े बदलाव संभव हैं।
छोटे-छोटे प्रयास ही भविष्य में बड़े परिणामों की नींव बनते हैं। यदि इसी तरह के अभियान लगातार चलते रहे, तो पहाड़ों के सूखते जल स्रोतों को फिर से जीवित किया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
इस अभियान का मूल संदेश स्पष्ट है, ‘जल बचेगा तो जंगल बचेंगे, जंगल बचेंगे तो हिमालय बचेगा और हिमालय बचेगा तो हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।’









