लोकगीतों की गूंज थमी: सुप्रसिद्ध लोकगायक दीवान कनवाल के निधन से सांस्कृतिक जगत में शोक

लोकगीतों की गूंज थमी: सुप्रसिद्ध लोकगायक दीवान कनवाल के निधन से सांस्कृतिक जगत में शोक

उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक और संस्कृतिकर्मी दीवान कनवाल के निधन से पूरे कुमाऊं क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई है। लोकगीत रसिकों को अपनी मधुर आवाज से दीवाना बनाने वाले इस कलाकार के जाने से सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति पहुंची है। अल्मोड़ा सहित आसपास के कस्बों और शहरों में उनके प्रशंसकों, कलाकारों और आम लोगों ने गहरा दुख व्यक्त किया है।

सी एम पपनैं

दीवान कनवाल अपनी कर्णप्रिय गायन शैली, अभिनय प्रतिभा और सरल व्यक्तित्व के कारण पहाड़ के जनमानस के बेहद करीब थे। वे लंबे समय तक पर्वतीय कला केंद्र, दिल्ली से जुड़े रहे और पिछले चार दशकों से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए सक्रिय रहे।

बचपन से ही लोकसंस्कृति से जुड़ाव

मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के खत्याड़ी गांव के निवासी दीवान कनवाल का लोकसंस्कृति से जुड़ाव बचपन से ही रहा। गांव में आयोजित होने वाली रामलीला में उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय त्रिलोक सिंह कनवाल को अभिनय करते देखा और वहीं से उनके भीतर रंगमंच और संगीत के प्रति रुचि जागी।

रामलीला के मंच से ही उन्होंने गायन और अभिनय की शुरुआत की। शुरुआत में छोटे पात्र निभाने के बाद उन्हें मंदोदरी, खर-दूषण और परशुराम जैसे महत्वपूर्ण किरदार निभाने का अवसर मिला। यही मंच आगे चलकर उनके सांस्कृतिक जीवन की मजबूत नींव बना।

शिक्षा और संगीत की शुरुआत

दीवान कनवाल की प्रारंभिक शिक्षा खत्याड़ी के प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने रैमजे इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। आगे की शिक्षा उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के नैनीताल कैंपस से बीकॉम और एमकॉम के रूप में प्राप्त की।

संगीत के क्षेत्र में उनका पहला बड़ा अवसर वर्ष 1980 में मिला, जब उन्हें आकाशवाणी से लोकगीत गाने का मौका मिला। पहली ही प्रस्तुति में उन्हें ‘बी ग्रेड’ गायक का दर्जा मिला, जिसने उनके आत्मविश्वास को नई उड़ान दी।

दिल्ली प्रवास और सांस्कृतिक प्रशिक्षण

रोजगार की तलाश में वर्ष 1984 में वे दिल्ली पहुंचे। वहां काम के साथ-साथ उन्होंने सांस्कृतिक गतिविधियों को जारी रखा और मंडी हाउस स्थित पर्वतीय कला केंद्र में प्रशिक्षण लिया। यहां उन्हें सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ मोहन उप्रेती, रंगमंच निर्देशक बृज मोहन शाह और अन्य वरिष्ठ गुरुओं से संगीत और अभिनय की बारीकियां सीखने का अवसर मिला।

दिल्ली में रहते हुए उन्होंने कई गीत-नाट्यों में अभिनय और गायन किया, जिससे उनकी प्रतिभा और निखरती गई।

फिल्मों और एल्बमों में भी दी आवाज

कुमाऊंनी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में भी दीवान कनवाल की आवाज गूंजी। वर्ष 1984 में बनी आंचलिक फिल्म मेघा आ में उन्हें गीत गाने का अवसर मिला, जो उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

इसके बाद उन्होंने कई कुमाऊंनी फिल्मों और एल्बमों में गीत गाए। उनके लोकप्रिय गीतों में “दाज्यु हमार जवाई रिषे ग्ये”, “आज कुछे मैत जा”, “कस भिड़े कुनई पंडित ज्यू कस करछा ब्या” और “ह्यू भरी दाना” जैसे गीत लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए।

सांस्कृतिक संस्था की स्थापना

अल्मोड़ा लौटने के बाद उन्होंने स्थानीय कलाकारों को साथ लेकर ‘हिमालय लोक कला केंद्र’ नामक सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने लोकनाट्य और लोकगीतों को मंच देने का काम किया।

संस्था ने ‘कलबिष्ट’, ‘गंगनाथ’, ‘हरुहित’, ‘बाइस भाई बफौल’, ‘तीलू रौतेली’ और ‘सरू कुमैण’ जैसे लोकनाटकों का मंचन किया, जिन्हें विभिन्न नाट्य महोत्सवों में सराहना और पुरस्कार मिले।

बैंक सेवा के साथ संस्कृति सेवा

वर्ष 1995 में अपने पिता के निधन के बाद दीवान कनवाल को जिला सहकारी बैंक अल्मोड़ा में नौकरी मिली। उन्होंने करीब 25 वर्षों तक विभिन्न शाखाओं में सेवा दी और वर्ष 2021 में वरिष्ठ शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए।

नौकरी के साथ-साथ उन्होंने लोकगीत, लोकनाट्य और सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर जारी रखा।

लोकसंस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान

दीवान कनवाल ने लगभग तीन सौ से अधिक गीत आकाशवाणी और विभिन्न मंचों पर गाए। उन्होंने पारंपरिक कुमाऊंनी गायन शैलियों जैसे न्योली, छपेली, झोड़ा और चांचरी को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे अक्सर कहा करते थे कि कलाकार को अपनी कला के माध्यम से समाज और संस्कृति से जुड़ा रहना चाहिए। उनका मानना था कि यदि गीत अपनी जमीन से कट जाएंगे, तो संस्कृति भी कमजोर हो जाएगी।

लोकसंस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया। इनमें मोहन उप्रेती सम्मान, गोपाल बाबू गोस्वामी लीजेंड अवॉर्ड और युवा फिल्म अवॉर्ड जैसे सम्मान प्रमुख हैं।

सांस्कृतिक जगत में शोक

दीवान कनवाल के निधन से उत्तराखंड के सांस्कृतिक जगत में गहरी शोक की लहर है। कलाकारों और उनके प्रशंसकों का कहना है कि उनकी आवाज और उनके गीत हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।

अपनी पूरी जिंदगी लोकसंस्कृति को समर्पित करने वाले दीवान कनवाल का सपना था कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहें और राज्य सांस्कृतिक समृद्धि की दिशा में आगे बढ़े।

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