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उत्तराखंड के जंगलों में चार गुना बढ़े गुलदार, खतरे में गांव!

उत्तराखंड के पहाड़ हमेशा से प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व का उदाहरण रहे हैं। लेकिन आज यह संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।

उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों एक अदृश्य लेकिन बेहद खतरनाक संकट से जूझ रहे हैं। यह संकट है — गुलदार की बढ़ती संख्या और घटते प्राकृतिक आवास का। जंगल, जो कभी इन खूबसूरत लेकिन घातक शिकारी जीवों के लिए पर्याप्त हुआ करते थे, अब उनके लिए छोटे पड़ने लगे हैं। नतीजतन, इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव एक गंभीर सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है।

जंगलों की क्षमता से चार गुना ज्यादा दबाव

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक हालिया शोध ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। अध्ययन के अनुसार, एक वयस्क गुलदार को अपने जीवन और शिकार के लिए लगभग 30 से 50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है।

उत्तराखंड का कुल वन क्षेत्र लगभग 24,686 वर्ग किलोमीटर है। इस आधार पर देखा जाए तो राज्य के जंगल अधिकतम 500 गुलदारों को ही समुचित रूप से समाहित कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक संख्या 2,275 तक पहुंच चुकी है।

इसका सीधा अर्थ है कि लगभग 1,775 गुलदार ऐसे हैं जिनके पास अपना कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है। ये ‘बेघर’ शिकारी अब भोजन और आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं।

खाली गांव और बंजर खेत

उत्तराखंड के पहाड़ों में तेजी से हो रहा पलायन इस संकट को और गहरा बना रहा है। शोध के मुताबिक, राज्य में करीब 3,940 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।

छोड़े गए खेत अब धीरे-धीरे जंगल का रूप ले रहे हैं, जहां लैंटाना जैसी आक्रामक झाड़ियां तेजी से फैल रही हैं। यह झाड़ियां गुलदारों के लिए छिपने और शिकार करने के लिए आदर्श माहौल तैयार करती हैं।

इस बदलते परिदृश्य में इंसानों और गुलदारों के बीच दूरी लगातार घट रही है और यही बढ़ते संघर्ष की सबसे बड़ी वजह बन रही है।

आंकड़ों में डरावनी हकीकत

टिहरी जिले में किए गए एक सर्वे के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में हर साल औसतन तीन लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई है, जबकि सात लोग घायल हुए।

वर्ष 2021 और 2022 में गुलदारों ने 172 पालतू पशुओं को भी मार डाला, जिससे ग्रामीणों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा।

पौड़ी गढ़वाल में स्थिति और भी गंभीर है। वर्ष 2025 में 15 से अधिक लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई, जबकि पिछले पांच वर्षों में यह आंकड़ा 27 तक पहुंच चुका है।

ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि पहाड़ के लोगों के रोजमर्रा के डर और असुरक्षा की कहानी बयां करते हैं।

संघर्ष के पीछे की असली वजह

यह संकट केवल गुलदारों की संख्या बढ़ने का परिणाम नहीं है, बल्कि कई कारकों का संयुक्त प्रभाव है:

  • आवास की कमी – सीमित जंगलों पर बढ़ता दबाव
  • मानव हस्तक्षेप – सड़क, निर्माण और अतिक्रमण
  • पलायन – खाली गांवों का वन क्षेत्र में बदलना
  • शिकार की कमी – प्राकृतिक शिकार घटने से गुलदार पालतू जानवरों और इंसानों के करीब आ रहे हैं

समाधान की तलाश

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल एकतरफा नहीं हो सकता। इसके लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है:

  • वन क्षेत्रों का संरक्षण और विस्तार
  • गांवों में पुनर्वास और आजीविका के अवसर
  • लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन (Conflict Mitigation)
  • स्थानीय लोगों को जागरूक और प्रशिक्षित करना

सह-अस्तित्व की चुनौती

उत्तराखंड के पहाड़ हमेशा से प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व का उदाहरण रहे हैं। लेकिन आज यह संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।

गुलदार न तो पूरी तरह दोषी है और न ही इंसान — समस्या उस बदलते पर्यावरण की है, जिसे हमने मिलकर बनाया है।

अब समय है कि इस संकट को केवल ‘खतरा’ नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखा जाए। अगर संतुलन बहाल नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह संघर्ष और भी भयावह रूप ले सकता है।

उत्तराखंड के जंगलों में बढ़ती गुलदारों की संख्या एक गंभीर पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत है। यह केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा, ग्रामीण जीवन और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

Written by
Hill Mail

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