उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था बदहाल होती नजर आ रही है। पिछले पांच वर्षों में 826 प्राथमिक विद्यालयों पर ताला लगना राज्य सरकार की विफलता को उजागर करता है।
छात्र संख्या शून्य होने का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि हालात यहां तक पहुंचे क्यों। सबसे ज्यादा टिहरी गढ़वाल में 262 और पौड़ी गढ़वाल में 120 स्कूल बंद हुए हैं। पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और अन्य पर्वतीय जिलों में भी बड़ी संख्या में विद्यालय बंद हुए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार पलायन को रोकने में सरकार नाकाम रही है। शिक्षकों की भारी कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी इसके प्रमुख कारण हैं।
आरोप है कि सरकार ने समय रहते कोई ठोस नीति नहीं बनाई। सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति के कारण अभिभावक निजी विद्यालयों की ओर रुख करने को मजबूर हैं।
विपक्ष ने इसे शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता बताया है, जबकि स्थानीय लोगों में भी इस मुद्दे को लेकर गहरी नाराजगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण ढांचे के कमजोर होने का संकेत है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में स्कूल बंद होने से बच्चों की शिक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। कई स्थानों पर बच्चों को दूर-दराज के स्कूलों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
इससे शिक्षा के अधिकार की भावना भी कमजोर पड़ती दिख रही है। यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है।
जनता अब सरकार से केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की मांग कर रही है।







