उत्तराखंड में शिक्षा की लागत को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य की पाठ्यपुस्तकों की कीमतें एनसीईआरटी की तुलना में काफी अधिक होने से छात्रों और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है, क्या पढ़ाई अब आवश्यकता से अधिक महंगी होती जा रही है? हाल ही में यह सामने आया है कि राज्य की पाठ्यपुस्तकों की कीमतें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पुस्तकों की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत तक अधिक हैं, जो निश्चित रूप से चिंताजनक है। एक ओर सरकार सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है, वहीं दूसरी ओर छात्रों और अभिभावकों पर महंगी किताबों का अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।
राज्य के लाखों छात्र सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत हैं, जिनके परिवार पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में पुस्तकों की बढ़ी हुई कीमतें उनके लिए और अधिक कठिनाई पैदा करती हैं। प्रश्न यह है कि जब एनसीईआरटी जैसी राष्ट्रीय संस्थाएं कम लागत में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकें उपलब्ध करा सकती हैं, तो उत्तराखंड में ऐसा क्यों संभव नहीं हो पा रहा है?
क्या यह केवल मुद्रण लागत का विषय है, या इसके पीछे अन्य प्रशासनिक या नीतिगत कारण हैं? इस संदर्भ में सरकार को पारदर्शिता दिखानी चाहिए और स्पष्ट करना चाहिए कि पुस्तकों की कीमतें इतनी अधिक क्यों हैं। शिक्षा का उद्देश्य लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रसार करना होना चाहिए।
उत्तराखंड सरकार और शिक्षा विभाग को चाहिए कि वे इस मुद्दे की गंभीरता से जांच करें तथा पुस्तकों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाएं। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो इसका सीधा प्रभाव छात्रों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर पड़ेगा।
इसके अतिरिक्त, निजी विद्यालयों पर भी सख्त निगरानी आवश्यक है, ताकि वे मनमाने ढंग से महंगी पुस्तकें छात्रों पर न थोप सकें। सरकार को एक समान पुस्तक नीति लागू करने पर विचार करना चाहिए, जिससे सभी छात्रों को समान अवसर प्राप्त हो सकें।
साथ ही, ऑनलाइन और डिजिटल माध्यमों के जरिए सस्ती या निःशुल्क पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास किए जाने चाहिए। स्थानीय प्रकाशकों और संबंधित विभागों के बीच पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना भी अत्यंत आवश्यक है। अभिभावकों की शिकायतों के समाधान के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा में असमानता और अधिक बढ़ सकती है। अंततः, शिक्षा को सुलभ, किफायती और समावेशी बनाना ही एक विकसित समाज की पहचान है।







