सरकारी स्कूलों का बखान, लेकिन भरोसा नहीं: अफसरों के बच्चे निजी स्कूलों में

सरकारी स्कूलों का बखान, लेकिन भरोसा नहीं: अफसरों के बच्चे निजी स्कूलों में

देहरादून जनपद में चल रहे प्रवेशोत्सव अभियान के बीच सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई एक बार फिर सामने आई है। एक ओर अधिकारी और जनप्रतिनिधि आम जनता से सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके अपने बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

जिले में शिक्षा विभाग द्वारा बड़े स्तर पर नामांकन अभियान चलाया जा रहा है। स्कूलों में कार्यक्रम आयोजित कर नए बच्चों का स्वागत किया जा रहा है और अभिभावकों को सरकारी स्कूलों की सुविधाओं के बारे में बताया जा रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक, देहरादून में इस सत्र में 9000 से अधिक छात्रों ने सरकारी स्कूलों में प्रवेश लिया है। प्राथमिक स्तर पर हजारों बच्चों का नामांकन हुआ है, जबकि माध्यमिक स्तर पर भी अच्छी संख्या में दाखिले दर्ज किए गए हैं।

इसके बावजूद, एक भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि का बच्चा इन स्कूलों में पढ़ता नजर नहीं आता। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर अधिकारी खुद अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजेंगे, तो आम जनता को कैसे विश्वास होगा।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी, संसाधनों का अभाव और बुनियादी सुविधाओं की दिक्कतें अब भी बनी हुई हैं। कई स्कूलों में कक्षाएं ठीक से संचालित नहीं हो पा रही हैं, जिससे अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।

वहीं, कुछ शिक्षकों का कहना है कि अगर उच्च अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने आएं, तो व्यवस्था में अपने आप सुधार देखने को मिलेगा और जवाबदेही भी तय होगी।

प्रवेशोत्सव के तहत स्कूलों में बच्चों को किताबें, कॉपियां और अन्य शैक्षणिक सामग्री भी वितरित की जा रही है। बच्चों का स्वागत तिलक लगाकर किया गया और उन्हें स्कूल से जोड़ने की कोशिश की गई।

इसके अलावा, शिक्षा विभाग द्वारा घर-घर जाकर संपर्क अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसमें अभिभावकों को सरकारी स्कूलों के फायदों के बारे में बताया जा रहा है।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि नामांकन बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर भी काम किया जा रहा है। आने वाले समय में सरकारी स्कूलों की स्थिति और बेहतर होगी।

फिलहाल, यह सवाल लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग खुद सरकारी स्कूलों पर भरोसा नहीं दिखा रहे, तो आम जनता से ऐसी उम्मीद क्यों की जा रही है।

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