उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों में कार्यरत भोजन माताएं आज भी आर्थिक और सामाजिक उपेक्षा का सामना कर रही हैं।
बच्चों के लिए पोषणयुक्त भोजन तैयार करना, रसोई की स्वच्छता बनाए रखना और समय पर भोजन उपलब्ध कराना—ये सभी जिम्मेदारियां वे पूरी निष्ठा के साथ निभाती हैं। इसके बावजूद उन्हें मात्र ₹3000 मासिक वेतन दिया जाता है, जो उनके श्रम के मुकाबले बेहद कम है।
आज के बढ़ते महंगाई के दौर में इतनी अल्प आय में परिवार का पालन-पोषण करना अत्यंत कठिन हो गया है। कई बार तो उन्हें अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती करनी पड़ती है, ताकि घर का खर्च किसी तरह चल सके। दूसरी ओर, शहरों में काम करने वाले सामान्य मजदूर भी इससे कहीं अधिक आय अर्जित करते हैं।
यह असमानता न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के मनोबल को भी कमजोर कर रही है। कम वेतन और सीमित अवसरों के कारण गांवों से शहरों की ओर पलायन लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर राज्य के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ रहा है।
भोजन माताएं वर्षों से वेतन वृद्धि और बेहतर सुविधाओं की मांग करती आ रही हैं, लेकिन उनकी आवाज अब तक प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से नहीं सुनी गई है। यह स्थिति न केवल उनके साथ अन्याय है, बल्कि उनके योगदान का भी अपमान है।
सरकार को यह समझना होगा कि भोजन माताएं केवल कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उन्हें सम्मानजनक वेतन के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और अन्य आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।
यदि उनकी समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर मिड-डे मील योजना और बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि सरकार ठोस और सकारात्मक कदम उठाए।
भोजन माताओं के परिश्रम को पहचानना और उन्हें उनका अधिकार देना केवल सरकार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की भी जिम्मेदारी है।







