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उत्तराखंड न्यूज़देहरादूनपौड़ी गढ़वालसरोकार

सीमा से खेत तक: कर्नल यशपाल नेगी की प्रेरक कहानी, जिन्होंने वर्दी के बाद मिट्टी से रचा नया इतिहास

उत्तराखंड की वीर भूमि ने हमेशा ऐसे सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। उन्हीं में से एक नाम है कर्नल यशपाल नेगी का, जिनकी जीवन यात्रा साहस, अनुशासन और समर्पण की अनूठी मिसाल है। भारतीय सेना में कर्नल के पद पर रहते हुए उन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपने कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव से हर चुनौती का डटकर सामना किया।

सेना में उनका जीवन कठिन परिस्थितियों और अनुशासन से भरा रहा, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति में अपने दायित्वों को सर्वोपरि रखा। उनके नेतृत्व और बहादुरी ने न केवल उनके साथियों को प्रेरित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत संदेश छोड़ा—कि देश सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। उनका सैन्य जीवन युवाओं के लिए आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

हालांकि, कर्नल नेगी की असली पहचान केवल सेना तक सीमित नहीं रही। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने उन्हें और भी खास बना दिया। उन्होंने शहरों की सुविधाओं को छोड़कर अपने पहाड़, अपनी मिट्टी और अपने गांव की ओर रुख किया। यह कदम उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार पलायन एक गंभीर समस्या बन चुका है।

अपने गांव लौटकर उन्होंने खेती को अपनाया और इसे एक नए दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने पारंपरिक कृषि ज्ञान को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़कर एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जिसने न केवल उनकी आजीविका को सशक्त बनाया, बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि सही सोच और मेहनत हो, तो पहाड़ की जमीन भी सोना उगल सकती है।

कर्नल नेगी ने खेती को केवल एक पेशा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान का माध्यम बनाया। उनके प्रयासों से कई स्थानीय लोग भी खेती की ओर लौटने लगे हैं, जिससे गांवों में नई उम्मीद जगी है। उन्होंने युवाओं को यह संदेश दिया कि अपने गांव में रहकर भी सफलता हासिल की जा सकती है।

अब वह अपने गाँव का प्रधान है, और इस भूमिका में भी वे अपने क्षेत्र के विकास, लोगों की भलाई और गांव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

आज कर्नल यशपाल नेगी केवल एक पूर्व सैनिक नहीं, बल्कि एक परिवर्तन के प्रतीक बन चुके हैं। उन्होंने पहले देश की सीमाओं की रक्षा की और अब अपने गांव और समाज को सशक्त बनाने में जुटे हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची सेवा केवल वर्दी तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में की जा सकती है।

उत्तराखंड की यह पावन धरती अपने इस वीर सपूत पर गर्व करती है, जिसने देश सेवा के बाद अब अपनी मिट्टी को नई पहचान देने का संकल्प लिया है।

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Hill Mail

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