उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी गांवों में आज भी विकास की तस्वीर अधूरी दिखाई देती है। एक ओर सरकार गांव-गांव सड़क पहुंचाने और सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर कई गांव ऐसे हैं जहां आज भी बीमारों और गर्भवती महिलाओं को डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। चमोली जिले के देवाल ब्लॉक का बलाण गांव और उत्तरकाशी के नौगांव क्षेत्र का दोणी गांव इसी दर्दनाक हकीकत की कहानी बयां कर रहे हैं।
देवाल ब्लॉक के दूरस्थ बलाण गांव में सड़क सुविधा का अभाव ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बना हुआ है। यहां के लोग वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन हालात अब भी नहीं बदले हैं। बुधवार को गांव की 54 वर्षीय तुलसी देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उनके शरीर में सूजन और तेज दर्द होने लगा, जिससे हालत गंभीर हो गई। गांव में सड़क न होने के कारण एंबुलेंस पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में ग्रामीणों ने इंसानियत और एकजुटता का परिचय देते हुए उन्हें डंडी-कंडी में बैठाकर दुर्गम पहाड़ी रास्तों से करीब तीन किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
ग्रामीणों के लिए यह सफर आसान नहीं था। संकरे रास्ते, खड़ी चढ़ाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच बीमार महिला को कंधों पर उठाकर ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं था। ठिकाणीगैर से खारगैर मोटर मार्ग तक पहुंचाने के बाद निजी वाहन की मदद से उन्हें इलाज के लिए देहरादून के जौलीग्रांट अस्पताल भेजा गया। इस दौरान गांव के कई लोगों ने मिलकर सहयोग किया।
गांव के पूर्व उप प्रधान विरेन्द्र राम कनियाल ने बताया कि बलाण गांव में सड़क निर्माण का कार्य प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत शुरू तो किया गया है, लेकिन निर्माण की गति बेहद धीमी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क समय पर बन गई होती तो बीमार महिला को इस तरह कंधों पर ढोने की नौबत नहीं आती। लोगों में निर्माण कार्य को लेकर गहरी नाराजगी है और वे जल्द सड़क निर्माण पूरा करने की मांग कर रहे हैं।
यह समस्या केवल बलाण गांव तक सीमित नहीं है। उत्तरकाशी जिले के नौगांव क्षेत्र में स्थित दोणी गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। खांसी क्षेत्र का यह गांव आजादी के दशकों बाद भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। यहां लगभग 35 परिवार रहते हैं और आबादी 200 से अधिक है। गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को चार किलोमीटर सड़क मार्ग और उसके बाद छह किलोमीटर पैदल सफर तय करना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क न होने के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाओं के लिए उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गांव के अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं, लेकिन बाजार तक पहुंच न होने से उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। बरसात और बर्फबारी के समय हालात और अधिक कठिन हो जाते हैं।
स्थानीय निवासी धीरपाल सिंह, शिवपाल, कृष्णा और जयवीर ने बताया कि गांव के लोग वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि सड़क निर्माण की प्रक्रिया जारी है। अधिशासी अभियंता योगेन्द्र ने बताया कि खांसी से दोणी गांव तक मोटर मार्ग की स्वीकृति की प्रक्रिया चल रही है और वित्तीय मंजूरी मिलते ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
वहीं विधायक भूपाल राम टम्टा ने कहा कि सरकार सभी गांवों को सड़क सुविधा से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है और बलाण गांव तक सड़क निर्माण कार्य जल्द पूरा किया जाएगा।
पहाड़ के इन गांवों की तस्वीर आज भी कई सवाल खड़े करती है। जब देश डिजिटल और आधुनिक विकास की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तब पहाड़ के लोग अब भी बीमारों को कंधों पर ढोने को मजबूर हैं। यह केवल सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि पहाड़ की पीड़ा और विकास की अधूरी कहानी है।







