मोबाइल की घंटियों में बसती हैं गौना गांव की माताओं की उम्मीदें

मोबाइल की घंटियों में बसती हैं गौना गांव की माताओं की उम्मीदें

बेटे विदेशों में, लेकिन गांव की धड़कनों में आज भी जिंदा है अपनापन, पहाड़ के छोटे-से गांव गौना की सुबह अब सिर्फ पक्षियों की चहचहाहट से नहीं होती, बल्कि मोबाइल की घंटियों से भी शुरू होती है। हर दिन एक कॉल का इंतजार यहां की माताओं की जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन चुका है। कोई बेटा दुबई के होटल में नौकरी कर रहा है, कोई बंगलूरू की चमकती दुनिया में अपनी पहचान बना रहा है तो कोई जर्मनी में अपने सपनों को आकार दे रहा है। लेकिन इन सबके बीच गांव की माताएं आज भी अपने आंगन, खेत-खलिहानों और घर की चौखट से जुड़ी हुई हैं।

घनसाली ब्लॉक मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर नागेश्वरसौड़-कोट मोटर मार्ग पर स्थित गौना गांव वर्ष 2005 में सड़क से जुड़ा था। गांव में करीब ढाई सौ परिवार रहते हैं। खास बात यह है कि पिछले दो दशकों में यहां से बहुत कम पलायन हुआ है। गांव के लगभग 90 प्रतिशत युवा देश-विदेश में होटल व्यवसाय से जुड़े हैं, फिर भी गांव आज भी आबाद और जीवंत है।

गांव की नत्थी देवी की जिंदगी संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक है। उनके पति नारायण सिंह सऊदी अरब में होटल व्यवसाय से जुड़े थे, लेकिन कोरोना काल में उनका निधन हो गया। उस समय उनके दोनों बेटे पढ़ाई कर रहे थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आज उनके बेटे सचिन और सचिव बंगलूरू में नौकरी कर रहे हैं। नत्थी देवी आज भी गांव में अकेले रहकर घर और खेत संभाल रही हैं, लेकिन हर दिन बेटों की फोन कॉल उनके चेहरे पर मुस्कान ले आती है।

सौणी देवी की कहानी भी पहाड़ की उन माताओं की कहानी है, जिन्होंने संघर्षों को अपनी ताकत बना लिया। उनके पति स्वर्गीय पूरण सिंह बिष्ट पंजाब में होटल व्यवसाय से जुड़े थे। पति के निधन के बाद चार बेटों की जिम्मेदारी अकेले उनके कंधों पर आ गई। सबसे छोटा बेटा उस समय मात्र चार महीने का था। कठिन हालात के बावजूद उन्होंने बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। आज उनके बेटे दीपक और वीरेंद्र बंगलूरू में, जितेंद्र दुबई में होटल व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि सबसे छोटा बेटा सुरेश नई टिहरी में कार्यरत है।

65 वर्षीय कौरा देवी और उनके पति डबल सिंह भी गांव में रहकर अपने पुश्तैनी घर को संभाल रहे हैं। उनका बड़ा बेटा सुमन जर्मनी में होटल व्यवसाय से जुड़ा है, जबकि छोटा बेटा अमित दुबई में नौकरी करता है। इसी तरह सोना देवी और उनके पति पुरुषोत्तम सिंह के दोनों बेटे बंगलूरू में कार्यरत हैं, लेकिन उनका मन आज भी गांव से जुड़ा हुआ है।

गांव के प्रधान पूरब सिंह रावत बताते हैं कि गौना गांव के करीब 90 प्रतिशत युवा देश-विदेश में होटल व्यवसाय से जुड़े हैं। कई परिवारों में सिर्फ माता-पिता ही गांव में रह रहे हैं, लेकिन बच्चों का अपने गांव और माताओं से भावनात्मक जुड़ाव आज भी मजबूत बना हुआ है। यही कारण है कि गांव में पलायन बहुत कम हुआ है।

गौना गांव की माताएं आज भी बेटों की आवाज में अपना संसार खोज लेती हैं। मोबाइल की हर घंटी उनके लिए सिर्फ एक कॉल नहीं, बल्कि दूर बैठे अपने बच्चों के प्यार, अपनापन और उम्मीदों का संदेश होती है।

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