बूंद-बूंद को तरसता पौड़ी: सूखते जलस्रोतों के बीच पानी के लिए रोज जंग लड़ रहे पहाड़

बूंद-बूंद को तरसता पौड़ी: सूखते जलस्रोतों के बीच पानी के लिए रोज जंग लड़ रहे पहाड़

हर तीसरी शिकायत पानी से जुड़ी, महिलाएं आधा किलोमीटर दूर स्रोतों से ढो रही पानी, प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ी संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाला पौड़ी गढ़वाल आज भीषण जल संकट की मार झेल रहा है। हालात ऐसे हैं कि जिले में हर तीसरी शिकायत पानी से जुड़ी हुई है। कहीं नलों में कई दिनों तक पानी नहीं आ रहा, तो कहीं लोग सूख चुके हैंडपंपों और खत्म होते जलस्रोतों के बीच बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लगातार घटती बारिश और सूखते प्राकृतिक स्रोतों ने लोगों की परेशानी कई गुना बढ़ा दी है।

जिला प्रशासन के अनुसार गर्मियों के मौसम में जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है। जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया ने बताया कि प्रशासन के पास आने वाली शिकायतों में बड़ी संख्या पेयजल संकट से जुड़ी होती है। इनमें पानी की कमी के साथ-साथ वितरण को लेकर आपसी विवाद भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि समस्या के समाधान के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं और अलकनंदा नदी से पानी पहुंचाने के लिए लगभग 45 करोड़ रुपये की योजना पर काम चल रहा है।

प्रशासन और स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (सारा) मिलकर सूखते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही जल संस्थान के जूनियर इंजीनियरों को निर्देश दिए गए हैं कि गर्मियों के तीन महीनों तक वे प्रतिदिन कम से कम तीन गांवों का दौरा करें, लोगों की समस्याएं सुनें और उनका समाधान सुनिश्चित करें।

देवप्रयाग से पौड़ी की ओर बढ़ते ही जल संकट की भयावह तस्वीर साफ दिखाई देने लगती है। रास्तों में जगह-जगह सूखे हैंडपंप लोगों की प्यास और प्रशासनिक चुनौतियों की कहानी बयां करते नजर आते हैं। पयाल गांव से लेकर पौड़ी और खिसूं मार्ग तक कई हैंडपंप महीनों से सूखे पड़े हैं।

खिसूं क्षेत्र में स्थिति और भी चिंताजनक है। प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध इस इलाके में महिलाएं पानी के लिए रोज लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं। गृहणी ज्योति और प्रिया बताती हैं कि उनके गांव में तीन दिनों से पानी नहीं आया है। गांव में केवल एक ही जलस्रोत बचा है, जहां से पानी लाने के लिए उन्हें आधा किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है। कई अन्य महिलाएं भी बर्तन लेकर इधर-उधर पानी की तलाश में भटकती दिखाई देती हैं।

जलस्रोत के पास मिलीं किरण देवी और सरोजनी देवी बताती हैं कि यह समस्या नई नहीं है। कई गांवों के लोग इसी एकमात्र स्रोत पर निर्भर हैं। सुबह से लेकर शाम तक यहां पानी भरने वालों की कतार लगी रहती है। खिर्स गांव की कमलेश देवी कहती हैं कि यहां जल संकट इतना गहरा गया है कि इस पर लोकगीत तक बन गए हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “खिसू पानी बोर्डिंग लग्यूंच निरपाणी का डांडा…” यह गीत इलाके की पीड़ा को दर्शाता है।

जल संकट की सबसे बड़ी वजह घटती बारिश मानी जा रही है। मौसम विभाग के अनुसार पिछले वर्ष पौड़ी जिले में औसत वर्षा करीब 30 प्रतिशत कम दर्ज की गई। 1989 से 2018 तक के आंकड़ों में भी पौड़ी में मासिक और वार्षिक वर्षा में लगातार गिरावट का संकेत मिला है। यही कारण है कि जिले में जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। सारा के आंकड़ों के मुताबिक पौड़ी राज्य का दूसरा ऐसा जिला है, जहां सबसे अधिक जलस्रोत सूख चुके हैं। सरकारी रिकॉर्ड में ऐसे स्रोतों की संख्या 664 बताई गई है, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

जल संकट से राहत दिलाने के लिए नयार नदी पर आधारित कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है। जल निगम के अधिकारियों के अनुसार जिले में 22 पंपिंग योजनाओं में से 14 नयार नदी से जुड़ी हैं। अब तक 21 में से 17 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं और शेष योजनाओं के पूरा होने पर करीब 240 गांवों को बेहतर पेयजल सुविधा मिलने की उम्मीद है।

पर्वतीय जिलों में बढ़ता जल संकट अब केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी बन चुका है। यदि समय रहते जल संरक्षण और स्रोतों के पुनर्जीवन पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है।

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