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आस्था के साथ बढ़ता प्लास्टिक का संकट: चारधाम यात्रा में हिमालय पर मंडरा रहा पर्यावरणीय खतरा

चारधाम यात्रा में इस वर्ष श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड संख्या जहां उत्तराखंड की धार्मिक और आर्थिक गतिविधियों के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर हिमालयी पारिस्थितिकी पर बढ़ते प्लास्टिक कचरे ने गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। यात्रा मार्गों, नदी तटों और धामों के आसपास फैल रहा सिंगल यूज प्लास्टिक अब हिमालय की संवेदनशील प्रकृति के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन और जल प्रदूषण जैसी समस्याएं और भयावह हो सकती हैं।

चारधाम यात्रा इस वर्ष अप्रैल में शुरू हुई थी और मात्र 19 दिनों में ही 12 लाख से अधिक श्रद्धालु धामों तक पहुंच चुके हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ प्लास्टिक बोतलें, पॉलिथीन, खाने-पीने के पैकेट और कपड़ों का कचरा भी तेजी से बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक चारों धामों से करीब 129 टन कूड़ा एकत्र किया जा चुका है। इसमें यमुनोत्री पैदल मार्ग से लगभग 50 टन, केदारनाथ क्षेत्र से 63 टन, बदरीनाथ से 6.5 टन और गंगोत्री से 5.5 टन कचरा निकाला गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक का विघटन बेहद धीमी गति से होता है। दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभागाध्यक्ष डॉ. विजय श्रीधर के अनुसार सिंगल यूज प्लास्टिक ठंडे क्षेत्रों में 200 से 1000 वर्षों तक बना रह सकता है। समय के साथ यह छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों में बदल जाता है, जो ग्लेशियरों की सतह पर जमकर ब्लैक कार्बन जैसा प्रभाव पैदा करते हैं। इससे बर्फ तेजी से पिघलने लगती है और ग्लेशियर कमजोर होते जाते हैं। केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे ऊंचाई वाले संवेदनशील क्षेत्रों में यह स्थिति बेहद खतरनाक मानी जा रही है।

पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. अंकुर कंसल का कहना है कि एक किलो प्लास्टिक हजारों सूक्ष्म कणों में बदलकर मिट्टी और जल स्रोतों को लंबे समय तक प्रभावित करता है। इससे मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता घटती है, जबकि नदियों में पहुंचने वाले माइक्रोप्लास्टिक जलीय जीवों और जैव विविधता के लिए खतरा बन रहे हैं। यात्रा मार्गों पर फेंके जा रहे कपड़े और पूजा सामग्री भी भागीरथी, मंदाकिनी और अलकनंदा जैसी नदियों के उद्गम क्षेत्रों को प्रदूषित कर रहे हैं।

पर्यावरणविद सुरेश भाई का कहना है कि हिमालय केवल उत्तराखंड की धरोहर नहीं, बल्कि पूरे देश के जल और जलवायु संतुलन का आधार है। ऐसे में चारधाम यात्रा के दौरान स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामूहिक सामाजिक दायित्व के रूप में देखने की जरूरत है।

हालांकि सरकार और प्रशासन की ओर से प्लास्टिक कचरे के निस्तारण के लिए कई कदम उठाए गए हैं। यात्रा मार्गों पर 38 प्लास्टिक कॉम्पैक्टर और बेलिंग मशीनें लगाई गई हैं ताकि कचरे को सुरक्षित तरीके से रिसाइक्लिंग केंद्रों तक भेजा जा सके। इसके अलावा ‘मनी बैंक प्लास्टिक योजना’, वाटर एटीएम और आरओ प्लांट जैसी व्यवस्थाएं भी शुरू की गई हैं ताकि लोग प्लास्टिक बोतलों का कम उपयोग करें। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार यात्रा मार्गों और एंट्री प्वाइंट्स पर अतिरिक्त सफाई व्यवस्था और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए विशेष फंड भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। यात्रियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि आस्था के इस महापर्व को स्वच्छ और सुरक्षित बनाए रखना है तो हिमालय को प्लास्टिक मुक्त रखना हर श्रद्धालु की साझा जिम्मेदारी बनती है।

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Hill Mail

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