जिसे वन्यजीवों और जैव विविधता का समृद्ध प्रदेश माना जाता है, वहीं अब बाघ और तेंदुओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य के जंगलों में बीते तीन वर्षों के दौरान 345 बाघ और तेंदुओं की मौत ने वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण तंत्र की कार्यप्रणाली पर चिंता बढ़ा दी है। अवैध शिकार, सड़क और रेल दुर्घटनाएं, आपसी संघर्ष तथा प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ वन्यजीव अंगों की तस्करी भी इन मौतों का बड़ा कारण बन रही है।
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य में 45 बाघों की मौत दर्ज की गई। इनमें तीन बाघों का अवैध शिकार किया गया, जबकि नौ की मौत अज्ञात कारणों से हुई। पांच बाघ सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए और 20 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। इसके अलावा कुछ मामलों में रेल दुर्घटनाएं और अन्य हादसे भी सामने आए।
स्थिति तेंदुओं के मामले में और अधिक गंभीर दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार, तीन साल में 303 तेंदुओं की मौत हुई है। इनमें कई तेंदुए जाल में फंसकर मारे गए, कुछ रेल और सड़क दुर्घटनाओं की भेंट चढ़े, जबकि बड़ी संख्या में तेंदुओं की मौत आपसी संघर्ष और अन्य दुर्घटनाओं में हुई। वन विभाग के अनुसार, 64 तेंदुओं की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, जबकि पांच को मानव जीवन के लिए खतरनाक घोषित किए जाने के बाद मारना पड़ा।
विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध शिकार है। जहर, खटका और क्लच वायर जैसे खतरनाक तरीकों से वन्यजीवों का शिकार किया जा रहा है। खासतौर पर वन क्षेत्रों में अवैध रूप से रह रहे कुछ वन गुर्जरों पर वन्यजीव शिकार में संलिप्त होने के आरोप लगते रहे हैं। कई मामलों में वन्यजीव अंगों की तस्करी के नेटवर्क का भी खुलासा हुआ है।
हाल ही में हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज में दो बाघों को जहर देकर मारने का मामला सामने आया। इससे पहले भी कई घटनाओं में वन्यजीव अंगों के साथ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ मामलों में उत्तर प्रदेश सीमा से जुड़े लोगों की संलिप्तता भी सामने आई है। मोहंड क्षेत्र में तेंदुए की खाल के साथ वन गुर्जरों की गिरफ्तारी और वर्ष 2016 में गैंडीखत्ता में बाघ की खाल के साथ चार लोगों की गिरफ्तारी जैसे मामले वन्यजीव तस्करी की गंभीरता को दर्शाते हैं।
वन्यजीव संरक्षण के लिए विभाग ने एंटी पोचिंग सेल और सर्विलांस सिस्टम गठित किए हैं। जंगलों में गश्त बढ़ाई गई है और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बावजूद इसके, अवैध शिकार की घटनाएं पूरी तरह नहीं रुक पा रही हैं।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने भी माना है कि वन गुर्जरों के विस्थापन में चुनौतियां बनी हुई हैं। सरकार की ओर से प्रति परिवार 15 लाख रुपये तक का पुनर्वास पैकेज देने की पेशकश की गई थी, लेकिन विस्थापन की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। विभाग का मानना है कि जंगलों में मानवीय गतिविधियों का बढ़ता दबाव वन्यजीवों के लिए खतरा बन रहा है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड की समृद्ध वन्यजीव विरासत पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। बाघ और तेंदुए केवल जंगलों की शान ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन के महत्वपूर्ण आधार भी हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार, वन विभाग और समाज को मिलकर प्रभावी रणनीति अपनानी होगी, ताकि जंगलों के ये बेशकीमती प्रहरी सुरक्षित रह सकें।








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