“अपणी बोली, अपणी पहचान” दिल्ली-NCR में फिर गूंजेंगी गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाएं

“अपणी बोली, अपणी पहचान” दिल्ली-NCR में फिर गूंजेंगी गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाएं

दिल्ली-एनसीआर में बसे प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए अपनी मातृभाषा और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का एक अनूठा अभियान पिछले 15 वर्षों से लगातार चल रहा है। उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के तत्वावधान में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं की ग्रीष्मकालीन शिक्षण कक्षाएं हर वर्ष आयोजित की जाती हैं। वर्ष 2012 से शुरू हुई यह पहल आज एक विशाल सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।

मंच के संरक्षक डॉ. विनोद बछेती के नेतृत्व और भाषा प्रेमियों के सहयोग से इस वर्ष भी 24 मई 2026 से ग्रीष्मकालीन कक्षाओं का शुभारंभ किया जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में कुल 52 केंद्रों पर इन कक्षाओं का संचालन होगा। मई, जून और जुलाई के दौरान चलने वाली ये कक्षाएं बच्चों को अपनी जड़ों, लोकभाषाओं, खान-पान, रीति-रिवाजों और संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

आज के दौर में जब आधुनिकता और अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, तब नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और लोक परंपराओं से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में यह पहल केवल भाषा सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने का अभियान बन चुकी है। इन कक्षाओं में बच्चों को गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। साथ ही लोकगीत, लोककथाएं, पारंपरिक भोजन, रीति-रिवाज और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित कराया जाता है।

विशेष बात यह है कि इन कक्षाओं में केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि अभिभावक और समाज के वरिष्ठ लोग भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। इससे पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद मजबूत होता है और बच्चों में अपनी मातृभूमि के प्रति अपनापन बढ़ता है।

मंच का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करवाना भी है। लंबे समय से उत्तराखंड के बुद्धिजीवी, साहित्यकार और भाषा प्रेमी इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग कर रहे हैं। मंच का मानना है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान, संस्कृति और इतिहास की धरोहर होती है।

डॉ. विनोद बछेती का कहना है कि यदि नई पीढ़ी अपनी भाषा भूल जाएगी, तो आने वाले समय में हमारी लोकसंस्कृति भी कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए बच्चों को बचपन से ही अपनी मातृभाषा से जोड़ना बेहद जरूरी है। यही सोच इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।

पिछले डेढ़ दशक में हजारों बच्चे इन कक्षाओं से जुड़ चुके हैं। कई बच्चे अब अपनी बोली में कविता, गीत और संवाद करने लगे हैं। इससे न केवल भाषाओं के प्रति सम्मान बढ़ा है, बल्कि प्रवासी समाज में सांस्कृतिक एकता भी मजबूत हुई है।

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच की यह पहल वास्तव में उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी मिट्टी, भाषा और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना चाहते हैं। यह अभियान साबित करता है कि दूरी चाहे कितनी भी हो जाए, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव कभी कम नहीं होता।

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