स्थिति की गंभीरता को देखते हुए खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने शासन को प्रस्ताव भेजकर सीज की गई फैक्ट्रियों के बिजली और पानी के कनेक्शन तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की सिफारिश की है। विभाग का मानना है कि जब तक बंद फैक्ट्रियों की मूलभूत सुविधाएं चालू रहेंगी, तब तक अवैध गतिविधियों को रोक पाना मुश्किल होगा।
दरअसल, ड्रग्स एक्ट के तहत किसी फैक्ट्री को सील करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास होता है। लेकिन फैक्ट्री सील होने के बाद उसकी नियमित निगरानी की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन, पुलिस और औषधि प्रशासन विभाग पर आती है। यही वह कड़ी है, जहां सबसे बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। कई मामलों में फैक्ट्री सील होने के बावजूद अंदर मशीनें चलती रहीं और अवैध दवाओं का उत्पादन होता रहा, लेकिन संबंधित विभागों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
नकली दवाओं के खिलाफ कार्रवाई में पुलिस और औषधि विभाग के बीच समन्वय की कमी भी बड़ी समस्या बनती जा रही है। दोनों विभाग अक्सर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते नजर आते हैं। ड्रग्स एक्ट केंद्रीय कानून होने के कारण सीधे कार्रवाई का अधिकार केवल औषधि निरीक्षकों को ही प्राप्त है। ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह के अनुसार, किसी भी दवा का नमूना औषधि निरीक्षक की मौजूदगी में ही लिया जा सकता है। यदि सैंपल जांच में फेल होता है, तो औषधि निरीक्षक ही सेशन कोर्ट में मुकदमा दायर कर सकते हैं। यही वजह है कि पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती।
इस कानूनी प्रक्रिया का फायदा अवैध कारोबारी उठा रहे हैं। कई बार सूचना मिलने और कार्रवाई होने के बीच इतना समय निकल जाता है कि आरोपी सबूत मिटाने या उत्पादन बंद कर फरार होने में सफल हो जाते हैं। यही कारण है कि नकली दवा निर्माण के मामले बार-बार सामने आ रहे हैं।
हाल ही में देहरादून के सहसपुर क्षेत्र में कैप्टागन ड्रग बनाने वाली एक फैक्ट्री पकड़ी गई थी। चौंकाने वाली बात यह रही कि उस फैक्ट्री के पास किसी भी प्रकार की दवा निर्माण का लाइसेंस नहीं था। इसके बावजूद वहां बड़े स्तर पर अवैध उत्पादन किया जा रहा था। जांच में सामने आया कि पूर्व में भी गलत गतिविधियों के चलते इस फैक्ट्री को सील किया जा चुका था। इसके बावजूद दोबारा संचालन शुरू हो गया।
हरिद्वार में भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां पहले कार्रवाई के बाद फैक्ट्रियां बंद दिखाई गईं, लेकिन कुछ समय बाद फिर अवैध उत्पादन शुरू हो गया। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सील फैक्ट्रियों की निगरानी कौन कर रहा है और जिम्मेदार विभाग इतने गंभीर मामलों में भी सतर्क क्यों नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नकली दवाओं का कारोबार केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। यदि समय रहते कठोर निगरानी व्यवस्था, विभागीय समन्वय और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह अवैध नेटवर्क और अधिक खतरनाक रूप ले सकता है।


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