पिथौरागढ़ में अल्ट्रासाउंड सेवा ठप, मरीजों की बढ़ी परेशानी; पर्वतीय जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी चुनौती

पिथौरागढ़ में अल्ट्रासाउंड सेवा ठप, मरीजों की बढ़ी परेशानी; पर्वतीय जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी चुनौती

उत्तराखंड सरकार राज्य के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसका ताजा उदाहरण सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में देखने को मिला है, जहां जिला अस्पताल में तैनात एकमात्र रेडियोलॉजिस्ट के अवकाश पर जाने से सरकारी स्तर पर अल्ट्रासाउंड सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। इसके चलते 10 जून तक मरीजों को सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा नहीं मिल पाएगी।

अल्ट्रासाउंड सेवा बंद होने का सबसे अधिक असर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्ग मरीजों और दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों पर पड़ रहा है। जिन मरीजों को चिकित्सकों ने तत्काल जांच की सलाह दी है, उन्हें अब निजी अस्पतालों और क्लीनिकों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।

गुरुवार को बीडी पांडे जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने पहुंचे कई मरीजों को निराश होकर वापस लौटना पड़ा। मूनाकोट निवासी किशन धामी ने बताया कि पेट दर्द की शिकायत के बाद चिकित्सक ने उन्हें अल्ट्रासाउंड जांच कराने की सलाह दी थी, लेकिन अस्पताल पहुंचने पर अल्ट्रासाउंड कक्ष बंद मिला। ऐसे में उन्हें मजबूरी में निजी केंद्र में जांच कराने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

जिला अस्पताल प्रशासन के अनुसार अस्पताल में केवल एक ही रेडियोलॉजिस्ट तैनात हैं और उनके अवकाश पर रहने के कारण अल्ट्रासाउंड सेवाएं प्रभावित हुई हैं। प्रभारी प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एम.एस. रजवार ने बताया कि रेडियोलॉजिस्ट 10 जून तक अवकाश पर हैं। उनके वापस लौटने के बाद ही नियमित अल्ट्रासाउंड सेवा शुरू हो सकेगी।

इसका असर केवल जिला अस्पताल तक सीमित नहीं है। जिला महिला अस्पताल में प्रत्येक बुधवार और शुक्रवार को लगने वाला अल्ट्रासाउंड शिविर भी प्रभावित हो गया है। यहां गर्भवती महिलाओं की जांच के लिए जिला अस्पताल के रेडियोलॉजिस्ट ही सेवाएं देते हैं। उनके अवकाश पर रहने से शुक्रवार का शिविर भी आयोजित नहीं हो सकेगा। इससे कई गर्भवती महिलाओं को जरूरी जांच के लिए इंतजार करना पड़ेगा या फिर निजी अस्पतालों का रुख करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी समस्या विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता है। कई अस्पतालों में रेडियोलॉजिस्ट, स्त्री रोग विशेषज्ञ, सर्जन और अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद लंबे समय से रिक्त हैं। ऐसे में किसी एक चिकित्सक के अवकाश पर जाने से पूरी सेवा व्यवस्था प्रभावित हो जाती है।

उत्तराखंड सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार नई योजनाएं लागू कर रही है। राज्य सरकार द्वारा टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार, चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता और चिकित्सकों की नियुक्तियों पर कार्य किया जा रहा है। बावजूद इसके सीमांत और दुर्गम क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है।

इधर भारत-नेपाल सीमा से लगे झूलाघाट प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र में भी स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी एक अन्य समस्या सामने आई है। यहां सफाई कर्मी की नियुक्ति नहीं होने से अस्पताल परिसर में स्वच्छता व्यवस्था प्रभावित हो रही है। ग्राम प्रधान रेखा भट्ट ने बताया कि क्षेत्र के कई गांवों के लोग उपचार के लिए इस स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर हैं, लेकिन सफाई कर्मी न होने से अस्पताल परिसर में गंदगी की समस्या बनी रहती है।

प्रभारी चिकित्सक डॉ. आंचल गोस्वामी के अनुसार स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन 50 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। सफाई कर्मचारी नहीं होने के कारण स्वास्थ्य कर्मियों को स्वयं सफाई व्यवस्था संभालनी पड़ती है। स्थानीय लोगों ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग से जल्द स्थायी सफाई कर्मी की नियुक्ति करने की मांग की है।

पिथौरागढ़ और झूलाघाट की ये स्थितियां दर्शाती हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ मानव संसाधन की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञ चिकित्सकों और सहायक कर्मचारियों की कमी दूर किए बिना ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। ऐसे में स्थानीय जनता की अपेक्षा है कि राज्य सरकार सीमांत जिलों में स्वास्थ्य ढांचे को और अधिक मजबूत बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाएगी।

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