हिमालयी पारिस्थितिकी, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत यूनेस्को विश्व धरोहर क्षेत्र नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में बायोडायवर्सिटी मॉनिटरिंग एक्सपेडिशन-2026 का शुभारंभ किया गया है। यह अभियान उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे पर्यावरणीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करेगा। रविवार को ज्योतिर्मठ में आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण मंत्री सुबोध उनियाल ने अभियान दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
इस अवसर पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, वन विभाग के अधिकारी तथा विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञ मौजूद रहे। अभियान का संचालन नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के उप वन संरक्षक अभिमन्यु सिंह के निर्देशन में किया जा रहा है।
विशेष महत्व का यह वैज्ञानिक अभियान प्रत्येक दस वर्ष में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क और ऋषिगंगा जलग्रहण क्षेत्र में आयोजित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र की जैव विविधता, हिमनदों की वर्तमान स्थिति, पारिस्थितिक तंत्र में हो रहे बदलाव, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तथा संभावित आपदा संवेदनशील क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन करना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय में तेजी से बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों को समझने के लिए ऐसे दीर्घकालिक अध्ययन अत्यंत आवश्यक हैं।
नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क और वैली ऑफ फ्लावर्स राष्ट्रीय उद्यान देश के पहले बायोस्फीयर रिजर्व के दो प्रमुख कोर जोन हैं। दोनों क्षेत्र अपनी अद्वितीय जैव विविधता, दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों के कारण यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। हिमालय के इन संवेदनशील क्षेत्रों में होने वाले पर्यावरणीय बदलाव न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी बल्कि देश की जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन रणनीतियों पर भी प्रभाव डालते हैं।
अभियान में उत्तराखंड वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान, जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान तथा हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और शोधकर्ता भाग ले रहे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय की ओर से भूविज्ञान विभाग के शोधकर्ता डॉ. सुनील सिंह शाह और कार्तिकेय बिष्ट इस महत्वपूर्ण अध्ययन अभियान में शामिल हैं। दोनों शोधकर्ता हिमालयी भू-आकृतियों, ग्लेशियरों और पर्यावरणीय परिवर्तनों से संबंधित अध्ययन में अपनी विशेषज्ञता प्रदान करेंगे।
अभियान के दौरान वैज्ञानिक वर्ष 2003 और 2015 में एकत्रित आंकड़ों की तुलना वर्तमान परिस्थितियों से करेंगे। इसके माध्यम से हिमाच्छादित क्षेत्रों में हुए बदलाव, ग्लेशियरों के आकार और विस्तार में परिवर्तन, नदी घाटियों की स्थिति, भू-कटाव की घटनाएं तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण किया जाएगा। वैज्ञानिक दल आधुनिक तकनीकों और फील्ड सर्वेक्षण के माध्यम से ऐसे आंकड़े जुटाएगा, जो आने वाले वर्षों में हिमालयी संरक्षण योजनाओं के लिए आधार बन सकते हैं।
वरिष्ठ भूवैज्ञानिक एवं हिमालयी शोधकर्ता प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट ने कहा कि यह गढ़वाल विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है कि उसके शोधकर्ता इस राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण अभियान का हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि हिमालयी ग्लेशियरों पर बढ़ते वैश्विक तापमान का प्रभाव लगातार देखा जा रहा है और ऐसे अध्ययन भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों को समझने में अहम भूमिका निभाएंगे। उनके अनुसार अभियान से प्राप्त वैज्ञानिक आंकड़े हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण, सतत विकास और आपदा जोखिम प्रबंधन की रणनीतियों को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायक होंगे।
अभियान के दौरान वैज्ञानिक दल क्षेत्र की दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों, हिमनदों और संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का विस्तृत सर्वेक्षण करेगा। इसके साथ ही पर्यावरणीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार किया जाएगा, जिससे भविष्य में नीति निर्माण और संरक्षण कार्यों को नई दिशा मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय आज जलवायु परिवर्तन के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। ऐसे में नंदा देवी जैसे संवेदनशील और वैश्विक महत्व के क्षेत्र में किया जा रहा यह अध्ययन न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरणीय भविष्य को समझने में महत्वपूर्ण साबित होगा। यह अभियान आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।








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