उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से आने वाले गंभीर मरीजों के लिए देश के प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थान एम्स ऋषिकेश की व्यवस्थाओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चमोली जिले के देवाल क्षेत्र में हुए भीषण सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल एक युवक को मेडिकल कॉलेज श्रीनगर से रेफर किए जाने के बावजूद एम्स में भर्ती नहीं किया गया। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने बेड उपलब्ध न होने का हवाला देकर मरीज को आकस्मिक विभाग के गेट से ही लौटा दिया और चिकित्सकों ने घायल की स्थिति तक देखने की जरूरत नहीं समझी।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार के लिए अक्सर एम्स ऋषिकेश भेजा जाता है। ऐसे में प्रदेश के सबसे बड़े रेफरल संस्थान से मरीजों को लौटाया जाना चिंता का विषय बन गया है।
सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ युवक, बीते बृहस्पतिवार को चमोली जिले के देवाल-घेस मोटर मार्ग पर एक टैक्सी वाहन अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गया था। हादसा इतना भयावह था कि चार लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि चार अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को तत्काल स्थानीय अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से उन्हें आगे के उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज श्रीनगर रेफर किया गया।
घायलों में हरेंद्र सिंह भंडारी की हालत सबसे अधिक गंभीर बताई गई। मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में सीटी स्कैन समेत अन्य जांचों के बाद चिकित्सकों ने उनकी स्थिति नाजुक बताते हुए रात करीब 12 बजे एम्स ऋषिकेश रेफर कर दिया। पूरी रात का सफर, लेकिन एम्स से मिली निराशा, घायल युवक के पिता पुष्कर सिंह भंडारी ने बताया कि परिवार पूरी रात एंबुलेंस से सफर कर शुक्रवार सुबह करीब चार बजे एम्स ऋषिकेश पहुंचा। उन्हें उम्मीद थी कि प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान में उनके बेटे को तत्काल उपचार मिलेगा, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि अस्पताल में कोई बेड उपलब्ध नहीं है।
परिजनों का आरोप है कि चिकित्सकों ने मरीज की गंभीर स्थिति देखने तक की कोशिश नहीं की और सीधे भर्ती करने से मना कर दिया। इससे परिवार गहरे सदमे में आ गया। एम्स से निराश होकर परिजन सुबह करीब पांच बजे हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट पहुंचे, लेकिन वहां भी उन्हें बेड उपलब्ध न होने की बात कहकर वापस भेज दिया गया। लगातार भागदौड़ और चिंता के बीच आखिरकार सुबह आठ बजे श्री महंत इंदिरेश अस्पताल में घायल को भर्ती कराया जा सका।
पुष्कर सिंह भंडारी के अनुसार उनके बेटे के दोनों कंधों और पसलियों में गंभीर चोटें हैं। इसके अलावा सिर में रक्त का थक्का बनने के कारण उसकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वर्तमान में उसका ऑपरेशन चल रहा है और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. पंकज अरोड़ा की निगरानी में उपचार किया जा रहा है।
घायल के पिता ने चिकित्सकों के व्यवहार को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जब उन्होंने बेड की उपलब्धता के बारे में पूछा तो उन्हें बेहद असंवेदनशील जवाब मिला।
पुष्कर सिंह के अनुसार एम्स के एक चिकित्सक ने कहा कि “जब कोई ऊपर जाएगा, तभी बेड खाली होगा।” इस कथित टिप्पणी ने परिवार की पीड़ा को और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि अस्पताल में लोग जीवन बचाने की उम्मीद लेकर आते हैं, ऐसे में चिकित्सकों से इस प्रकार के जवाब की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि एम्स की व्यवस्थाओं को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से चर्चा की जाएगी। साथ ही राज्य सरकार एम्स ऋषिकेश में अपना एक प्रतिनिधि तैनात करने पर विचार कर रही है, जो उत्तराखंड के मरीजों की सहायता करेगा और अस्पताल प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित करेगा। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि पहाड़ से आने वाले मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
एम्स ऋषिकेश के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. संदीप कुमार ने कहा कि अस्पताल में बेड की समस्या बनी हुई है। हालांकि उन्होंने चिकित्सकों के व्यवहार संबंधी शिकायतों पर चर्चा करने और मामले की जांच कराने की बात कही है।
गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है जब एम्स ऋषिकेश की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे हों। कुछ समय पहले पौड़ी जिला अस्पताल से एक गंभीर रूप से झुलसे मरीज को एम्स रेफर किया गया था, लेकिन वहां भी बेड न होने का हवाला देकर उसे भर्ती नहीं किया गया। बाद में अन्य अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उसकी मौत हो गई थी। उस घटना के बाद भी स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन ने एम्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे।
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर प्रदेश के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से आने वाले गंभीर मरीजों के लिए रेफरल व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि राज्य का सबसे बड़ा चिकित्सा संस्थान ही गंभीर मरीजों को वापस लौटा रहा है, तो पहाड़ के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा किस पर टिका रहेगा? यह सवाल आज पूरे उत्तराखंड के सामने खड़ा है।








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