उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पहचान रही रिस्पना (ऋषिअर्पणा) नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी स्वच्छ जलधारा के रूप में बहने वाली यह नदी अब प्रदूषण, अतिक्रमण और कचरे के बोझ तले कराहती नजर आ रही है। नदी के किनारों और जलधारा में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, घरेलू कचरा, निर्माण सामग्री और अन्य अपशिष्ट पदार्थों का अंधाधुंध निस्तारण किया जा रहा है, जिससे इसका प्राकृतिक स्वरूप लगातार नष्ट होता जा रहा है।
पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों का कहना है कि रिस्पना नदी की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है। राजधानी क्षेत्र के प्रमुख हिस्सों से होकर गुजरने वाली इस नदी के आसपास प्रतिदिन हजारों लोगों का आवागमन रहता है, लेकिन इसके बावजूद इसकी स्वच्छता और संरक्षण को लेकर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं दे रही है। कई स्थानों पर नदी का पानी काला पड़ चुका है और दुर्गंध के कारण आसपास के लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, रिस्पना अब नदी कम और प्रदूषण से भरा बहता हुआ नाला अधिक दिखाई देती है। जगह-जगह कूड़े के ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन और अन्य अपशिष्ट पदार्थ नदी में फेंके जा रहे हैं। इससे न केवल जल प्रदूषण बढ़ रहा है बल्कि आसपास के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में नदी का पुनर्जीवन और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
ऐसे में सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने रिस्पना नदी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि नदी में कचरा फेंकने वालों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है। सीसीटीवी कैमरों की मदद से ऐसे लोगों पर नजर रखी जा सकेगी और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी संभव हो पाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सफाई अभियान चलाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए निगरानी, जनजागरूकता और सख्त कार्रवाई तीनों की आवश्यकता है। यदि नदी किनारे संवेदनशील स्थानों पर कैमरे लगाए जाते हैं तो लोगों में जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी और वे सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने से बचेंगे। इससे नदी को स्वच्छ बनाए रखने के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।
रिस्पना नदी का संरक्षण केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि इसमें आम नागरिकों की सहभागिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नगर निगम, जिला प्रशासन, पर्यावरण संगठनों और स्थानीय समुदायों को मिलकर एक दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करनी होगी। नियमित सफाई अभियान, कचरा प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था, जनजागरूकता कार्यक्रम और सख्त दंडात्मक कार्रवाई जैसे कदम नदी के पुनर्जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इधर हाल ही में देहरादून के जिलाधिकारी आशीष चौहान ने रिस्पना नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में विशेष पहल शुरू की है। प्रशासन द्वारा नदी क्षेत्र का निरीक्षण कर सफाई और संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है। हालांकि पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह अभियान केवल कुछ दिनों तक सीमित न रहकर निरंतर चलाया जाना चाहिए। नदी संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और सतत प्रयास ही सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं।
रिस्पना केवल एक नदी नहीं, बल्कि देहरादून की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि इसे प्रदूषण मुक्त और स्वच्छ बनाया जाता है तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर साबित होगी। देहरादून जैसे सुंदर शहर की पहचान उसकी हरियाली, स्वच्छता और प्राकृतिक संपदा से है। ऐसे में रिस्पना नदी को पुनर्जीवित करना और उसे प्रदूषण मुक्त बनाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासनिक प्रयासों के साथ-साथ समाज भी इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाए, ताकि रिस्पना फिर से अपनी निर्मल धारा और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जानी जा सके।








Leave a Comment
Your email address will not be published. Required fields are marked with *