टीईटी की अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का सचिवालय कूच, पुलिस ने रास्ते में रोका

टीईटी की अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का सचिवालय कूच, पुलिस ने रास्ते में रोका

शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता को लेकर प्रदेशभर के प्राथमिक शिक्षकों में बढ़ता असंतोष सोमवार को सड़कों पर दिखाई दिया। राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में देहरादून पहुंचे शिक्षकों ने टीईटी से छूट की मांग को लेकर सचिवालय कूच किया। हालांकि पुलिस और प्रशासन ने शिक्षकों को सचिवालय पहुंचने से पहले ही बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके विरोध में शिक्षक सड़क पर ही धरने पर बैठ गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद की।

राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ से जुड़े शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय की निर्धारित शैक्षिक योग्यता और नियमों के अनुसार हुई थी, उनसे अब सेवा के अंतिम चरण में टीईटी उत्तीर्ण करने की अपेक्षा करना अन्यायपूर्ण है।

सोमवार सुबह परेड ग्राउंड में एकत्र हुए शिक्षकों ने सभा आयोजित कर अपनी मांगों और समस्याओं को विस्तार से रखा। इसके बाद उन्होंने सचिवालय की ओर मार्च शुरू किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर “टीईटी से मुक्ति दो”, “शिक्षकों के साथ अन्याय बंद करो” और “पुरानी पेंशन बहाल करो” जैसे नारे लिखे थे। बड़ी संख्या में मौजूद शिक्षकों ने सरकार से उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की।

प्रदर्शनकारी शिक्षकों का कहना था कि उन्होंने विभाग में नियुक्ति के समय सभी आवश्यक योग्यताओं और नियमों को पूरा किया था। कई शिक्षक पिछले 30 से 35 वर्षों से शिक्षा विभाग में सेवाएं दे रहे हैं और हजारों विद्यार्थियों को शिक्षित कर चुके हैं। ऐसे में सेवा के अंतिम वर्षों में उन्हें टीईटी पास करने की शर्त के अधीन करना उनके अनुभव और योगदान का अपमान है।

शिक्षकों ने कहा कि टीईटी की अनिवार्यता के कारण कई शिक्षकों की पदोन्नति प्रभावित हो रही है। साथ ही सेवा में बने रहने और भविष्य की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं। उनका कहना है कि लंबे अनुभव वाले शिक्षकों की योग्यता का मूल्यांकन केवल एक परीक्षा के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ की तदर्थ समिति के सदस्य मनोज तिवारी ने कहा कि शिक्षकों की मांग पूरी तरह न्यायसंगत है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से मुक्त रखने के लिए आवश्यक अध्यादेश लाना चाहिए। साथ ही राज्य सरकार को इस संबंध में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजकर सकारात्मक पहल करनी चाहिए।

रैली के संयोजक धर्मेंद्र रावत ने कहा कि यदि सरकार पूरी तरह से टीईटी से छूट देने में असमर्थ है तो शिक्षकों के लिए एक विशेष परीक्षा आयोजित की जा सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि यह परीक्षा अनुभव आधारित, सरल और व्यवहारिक होनी चाहिए, ताकि वर्षों से शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों के अनुभव को उचित महत्व मिल सके।

प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग भी प्रमुखता से उठाई। उनका कहना था कि नई पेंशन व्यवस्था कर्मचारियों के भविष्य को लेकर पर्याप्त सुरक्षा नहीं देती। शिक्षकों ने सरकार से पुरानी पेंशन योजना को पुनः लागू करने की मांग करते हुए कहा कि यह कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

सचिवालय की ओर बढ़ रहे शिक्षकों को पुलिस ने सुभाष रोड के निकट बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद शिक्षकों ने वहीं धरना शुरू कर दिया। कुछ समय तक प्रदर्शन और नारेबाजी जारी रही। बाद में प्रशासनिक अधिकारियों ने शिक्षकों से बातचीत की और उनकी मांगों को सरकार तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।

इसके उपरांत शिक्षकों ने स्थानीय प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। ज्ञापन में टीईटी की अनिवार्यता से छूट, पुरानी पेंशन योजना की बहाली और शिक्षकों के हितों से जुड़े अन्य मुद्दों पर शीघ्र निर्णय लेने की मांग की गई।

प्रदर्शन में दिगंबर सिंह नेगी, जितेंद्र सिंह वल्दिया, दीपक सजवाण, पूरन बोरा, वीरेंद्र सिंह, दीपक सिंह रावत, अश्वनी कुमार चौहान, विनोद रतूड़ी, उत्तम सिंह फर्त्याल सहित प्रदेशभर से आए बड़ी संख्या में शिक्षक शामिल रहे। शिक्षकों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

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