उत्तराखंड में एक जुलाई से खत्म होगा मदरसा बोर्ड, हजारों छात्रों को मिलेगा मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ने का अवसर

उत्तराखंड में एक जुलाई से खत्म होगा मदरसा बोर्ड, हजारों छात्रों को मिलेगा मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ने का अवसर

उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा बदलाव एक जुलाई 2026 से लागू होने जा रहा है। राज्य सरकार ने मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लागू करते हुए सभी मदरसों को अब उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के दायरे में लाने की प्रक्रिया पूरी कर ली है। नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के मदरसों में अब राज्य शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू होगा और उन्हें शिक्षा विभाग से मान्यता लेनी होगी। सरकार का दावा है कि इस फैसले से हजारों छात्र-छात्राएं मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सकेंगे तथा उनके शैक्षिक प्रमाणपत्रों को व्यापक मान्यता मिलेगी।

राज्य सरकार ने इस वर्ष फरवरी में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने निर्देश दिए थे कि जुलाई 2026 से सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अधीन लाया जाए और उनकी मान्यता उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के माध्यम से सुनिश्चित की जाए। इसी निर्णय के तहत अब मदरसा बोर्ड की व्यवस्था समाप्त हो रही है।

प्रदेश में वर्ष 2011 में मदरसा बोर्ड के गठन को मंजूरी मिली थी, लेकिन करीब 15 वर्षों के दौरान इसे राज्य शिक्षा बोर्ड के समकक्ष मान्यता नहीं मिल सकी। इसका सबसे बड़ा असर मदरसों में अध्ययनरत विद्यार्थियों पर पड़ा। यहां से जारी होने वाले प्रमाणपत्रों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अपेक्षित मान्यता नहीं मिलने के कारण छात्रों की संख्या लगातार घटती चली गई। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था इस समस्या का स्थायी समाधान साबित होगी।

नई व्यवस्था लागू होने के बाद मदरसों में राज्य शिक्षा बोर्ड का निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा। साथ ही सभी संस्थानों को शिक्षा विभाग से औपचारिक मान्यता प्राप्त करनी होगी। इससे वहां अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को अन्य सरकारी और निजी विद्यालयों के छात्रों के समान शैक्षणिक अवसर मिल सकेंगे। सरकार का कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और विद्यार्थियों के भविष्य के लिए नए रास्ते खुलेंगे।

उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने भी इस बदलाव का स्वागत किया है। उनका कहना है कि राज्य शिक्षा बोर्ड से मान्यता मिलने के बाद मदरसों से जारी होने वाले शैक्षिक प्रमाणपत्रों का महत्व काफी बढ़ जाएगा। अब तक तहतानिया, फौकानिया, मुंशी, मौलवी और आलिम जैसे पाठ्यक्रमों के प्रमाणपत्रों को समकक्ष मान्यता प्राप्त नहीं थी, जिसके कारण विद्यार्थी सरकारी नौकरियों सहित कई क्षेत्रों में इनका उपयोग नहीं कर पाते थे। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन प्रमाणपत्रों को अधिक स्वीकार्यता मिलने की उम्मीद है।

सरकार का यह भी मानना है कि प्रमाणपत्रों की वैधता बढ़ने से मदरसों में विद्यार्थियों की संख्या में फिर से वृद्धि हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में छात्र संख्या लगातार घटती रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार शैक्षिक सत्र 2023-24 में प्रदेश के मदरसों में 45 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत थे, जबकि 2024-25 में विशेष रूप से मुंशी, मौलवी और आलिम पाठ्यक्रमों में नामांकन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

हालांकि इस बदलाव के बीच मदरसा बोर्ड में कार्यरत कर्मचारियों के भविष्य को लेकर असमंजस भी बना हुआ है। बोर्ड में कुछ कर्मचारी पीआरडी तथा कुछ उपनल के माध्यम से कार्यरत हैं। कर्मचारियों ने सरकार से उनके समायोजन और सेवा संबंधी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। फिलहाल सरकार की ओर से इस संबंध में विस्तृत आदेश जारी होने की प्रतीक्षा की जा रही है।

उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन के साथ अब अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता, पाठ्यक्रम और शैक्षणिक मानकों की निगरानी इसी प्राधिकरण के माध्यम से की जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक समान नियामक व्यवस्था विकसित होगी और शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी एवं प्रभावी बनेगी।

एक जुलाई से लागू होने जा रहे इस फैसले को राज्य सरकार शिक्षा सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है। आने वाले समय में इसका वास्तविक प्रभाव मदरसों में नामांकन, विद्यार्थियों के शैक्षणिक अवसरों और रोजगार की संभावनाओं पर कितना पड़ता है, इस पर सभी की निगाहें रहेंगी।

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