करीब 20 किलोमीटर लंबी यह परियोजना लगभग 743 करोड़ रुपये की लागत से हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) पर बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच यातायात को सुगम बनाना, चारधाम यात्रा के दौरान लगने वाले जाम को कम करना तथा भविष्य की बढ़ती ट्रैफिक जरूरतों को पूरा करना है।
पेड़ कटान को लेकर उठा था विवाद
पिछले कुछ समय से स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों ने परियोजना के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि यह क्षेत्र हाथियों के महत्वपूर्ण कॉरिडोर का हिस्सा है और बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस मामले को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई थी।
NHAI का दावा- परियोजना पर्यावरण संरक्षण के साथ आगे बढ़ रही
NHAI ने स्पष्ट किया है कि परियोजना की रूपरेखा तैयार करते समय पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसके लिए सड़क का राइट ऑफ वे (ROW) 60 मीटर से घटाकर मात्र 23 मीटर कर दिया गया, ताकि कम से कम पेड़ों की कटाई करनी पड़े।
प्राधिकरण के अनुसार वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर 754 पेड़ों को प्रतिरोपित (Transplant) करने योग्य पाया गया है। इनके स्थानांतरण की प्रक्रिया भी निर्धारित मानकों के अनुसार की जाएगी।
वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम
परियोजना में वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कई विशेष संरचनाएं शामिल की गई हैं। इनमें एक बड़ा ब्रिज-कम-एलिफेंट अंडरपास, चार समर्पित हाथी अंडरपास, ग्रीन गाइड हेज, साउंड बैरियर और एंटी-ग्लेयर स्क्रीन बनाई जा रही हैं। इनका उद्देश्य हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना तथा सड़क दुर्घटनाओं की संभावना को कम करना है।
हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करने का दावा
NHAI ने कहा है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पेड़ कटान पर कोई स्थायी रोक लागू नहीं है। राज्य सरकार से आवश्यक कार्य अनुमति (Working Permission) मिलने और सभी वैधानिक मंजूरियां प्राप्त होने के बाद ही कार्य शुरू किया गया है। प्राधिकरण का कहना है कि परियोजना का प्रत्येक चरण सक्षम अधिकारियों की अनुमति और पर्यावरणीय शर्तों के अनुरूप संचालित किया जा रहा है।
परियोजना से होंगे कई लाभ
अधिकारियों का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच यात्रा अधिक तेज और सुरक्षित होगी। चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा और पर्यटन सीजन के दौरान लगने वाले भारी जाम से राहत मिलेगी। सड़क की चौड़ाई बढ़ने से दुर्घटनाओं में कमी आएगी और भविष्य में बढ़ने वाले यातायात का दबाव भी आसानी से संभाला जा सकेगा।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती
हालांकि NHAI का कहना है कि परियोजना विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का उदाहरण बनेगी, लेकिन पर्यावरणविद अब भी हाथी कॉरिडोर और हजारों पेड़ों की कटाई को लेकर चिंता जता रहे हैं। ऐसे में यह परियोजना उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण परीक्षा मानी जा रही है। आने वाले समय में न्यायालय की निगरानी, पर्यावरणीय शर्तों के पालन और वन्यजीव संरक्षण के उपायों पर सभी की नजर रहेगी।


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