उत्तराखंड के पहाड़ों से रोजगार की तलाश में हो रहे पलायन को रोकने के लिए स्वरोजगार और आधुनिक खेती को सबसे प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। पौड़ी जिले के बीरोंखाल विकासखंड के सीमांत गांव जमरिया के दो किसान सुरेंद्र सिंह रावत और मंगल सिंह चौधरी इस सोच को वास्तविकता में बदल रहे हैं। दोनों किसानों ने आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक खेती और उद्यान विभाग की योजनाओं का लाभ उठाकर सेब बागवानी में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आज वे न केवल अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं, बल्कि अपने क्षेत्र के अन्य किसानों और युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं।
कुछ वर्ष पहले तक पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले इन किसानों ने बदलते समय के साथ खेती के तौर-तरीकों में बदलाव किया। उन्होंने उद्यान विभाग के मार्गदर्शन में आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से सेब के पौधे लगाए। नियमित देखभाल, उन्नत तकनीक और बेहतर प्रबंधन का परिणाम यह रहा कि आज दोनों के बगीचों में लगभग 1500-1500 फलदार सेब के पौधे तैयार हैं।
सेब उत्पादन के साथ-साथ दोनों किसान अपनी भूमि का बहुआयामी उपयोग भी कर रहे हैं। बगीचों के बीच अन्य मौसमी फल, सब्जियां और विभिन्न कृषि गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, जिससे पूरे वर्ष आय का स्रोत बना रहता है। इस समेकित खेती मॉडल की बदौलत दोनों किसान सालाना चार से पांच लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं।
किसान सुरेंद्र सिंह रावत ने खेती के साथ-साथ मत्स्य पालन और बकरी पालन को भी अपनी आजीविका का हिस्सा बनाया है। इससे उनकी आय में अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई है। उनका मानना है कि यदि किसान केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय विविध गतिविधियों को अपनाएं तो जोखिम कम होता है और आमदनी लगातार बनी रहती है।
दोनों किसानों की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं है। उनके बगीचों और कृषि कार्यों में स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिल रहा है। इससे गांव के लोगों को अपने ही क्षेत्र में काम का अवसर मिल रहा है और रोजगार के लिए बाहर जाने की आवश्यकता कम हो रही है। यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जमरिया गांव के इन किसानों ने यह साबित कर दिया है कि पहाड़ की जलवायु और प्राकृतिक परिस्थितियां यदि वैज्ञानिक तरीके से उपयोग की जाएं तो यहां उच्च मूल्य वाली बागवानी और आधुनिक कृषि से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। पहले जहां सेब की व्यावसायिक खेती कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित मानी जाती थी, वहीं अब पौड़ी जैसे इलाकों में भी इसकी सफलता नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में आधुनिक बागवानी, जैविक खेती और बहुउद्देशीय कृषि को बढ़ावा देकर पलायन की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार की सुविधा और सरकारी योजनाओं का प्रभावी लाभ मिले तो हजारों युवा गांवों में रहकर ही सम्मानजनक आय अर्जित कर सकते हैं।
सुरेंद्र सिंह रावत और मंगल सिंह चौधरी की कहानी इसी बदलाव का जीवंत उदाहरण है। उनकी मेहनत, दूरदर्शिता और नवाचार ने यह संदेश दिया है कि खेती केवल परंपरा नहीं, बल्कि आधुनिक समय में एक सफल व्यवसाय भी बन सकती है। उनकी सफलता उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने की सोचते हैं।
आज जमरिया गांव के ये दोनों किसान उत्तराखंड में रिवर्स माइग्रेशन (घर वापसी) की नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। उनकी उपलब्धि यह साबित करती है कि यदि आधुनिक तकनीक, सरकारी सहयोग और मेहनत का सही समन्वय हो, तो पहाड़ का भविष्य बदला जा सकता है। उनकी यह प्रेरक यात्रा पूरे उत्तराखंड के किसानों और युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता, नवाचार और ग्रामीण विकास का मजबूत संदेश लेकर आई है।








Leave a Comment
Your email address will not be published. Required fields are marked with *