प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन के बाद भागीरथी बिष्ट को तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी ने पदक देकर सम्मानित किया। सीमांत पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाने वाली भागीरथी की सफलता को ग्रामीणों ने क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बताया है।
गांव की पगडंडियों से अंतरराष्ट्रीय दौड़ तक का सफर
भागीरथी बिष्ट का दौड़ से जुड़ाव किसी बड़े शहर के आधुनिक ट्रैक से नहीं, बल्कि पहाड़ के गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ। सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने लगातार अभ्यास जारी रखा। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित मैराथन प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करना शुरू किया।
भागीरथी के कोच और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर निवासी अंतरराष्ट्रीय मैराथन धावक सुनील शर्मा के मुताबिक, भागीरथी नियमित रूप से कठिन प्रशिक्षण ले रही हैं। उनकी फिटनेस, अनुशासन और लगातार मेहनत ने उन्हें लंबी दूरी की दौड़ में मजबूत खिलाड़ी बनाया है।
ईरान में भी कर चुकी हैं भारत का प्रतिनिधित्व
भागीरथी बिष्ट की उपलब्धियों का सिलसिला केवल देश तक सीमित नहीं है। वह इससे पहले ईरान में आयोजित 42 किलोमीटर की मैराथन प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित कई मैराथन प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है।
इसी वर्ष फरवरी में आयोजित दिल्ली मैराथन में भी भागीरथी ने महिला वर्ग की 42 किलोमीटर दौड़ में सिल्वर मेडल जीता था। उन्होंने दिल्ली मैराथन की यह दौड़ 2 घंटे 43 मिनट में पूरी की थी। लगातार दो बड़ी प्रतियोगिताओं में पदक जीतना उनकी मेहनत और प्रतिभा को दर्शाता है।
ओलंपिक में गोल्ड जीतना है सपना
भागीरथी बिष्ट का लक्ष्य अब और बड़ा है। उनके कोच सुनील शर्मा के अनुसार, भागीरथी भविष्य में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हैं और देश के लिए मैराथन में गोल्ड मेडल जीतने का सपना देख रही हैं।
कोच का कहना है कि भागीरथी में प्रतिभा के साथ कठिन परिस्थितियों में भी लगातार मेहनत करने का मजबूत जज्बा है। पहाड़ में सीमित सुविधाओं के बीच प्रशिक्षण लेकर उन्होंने जिस तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है, वह दूसरी युवा खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है।
भागीरथी की कहानी उन पहाड़ी बेटियों के सपनों की कहानी है, जो संसाधनों की कमी के बावजूद अपने हौसले और मेहनत के दम पर आगे बढ़ना चाहती हैं। वाण गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ उनका दौड़ का सफर अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंच चुका है। हैदराबाद का यह रजत पदक उनके खेल जीवन में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि बन गया है। अब नजरें उनके अगले लक्ष्य पर है।




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